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शनिवार, 18 नवंबर 2017

बोर्ड की परीक्षा (हास्य कविता)


बोर्ड की परीक्षा में
हाई स्कूल की कक्षा में
एक भाई साहब
मेज पर चाकू गाड़े
परीक्षा देने में तल्लीन थे ।
निरीक्षक ने देखा
पहले खिसिआया
फिर झल्लाया
अंत में छात्र के समक्ष
करबद्ध हो कर
धीरे से बड़बड़ाया ।
हे आर्य ! हे करूश्रेष्ठ
आप कॉपी रूपी रणक्षेत्र में
युद्ध खंजर से क्यूं लड़ रहे हैं ?
कॉपी पर जूझ रहा छात्र
गुरू को कुपित नेत्रों से घूर कर
ज़ोर से चिघांड़ा ।
हे विद्यापति ! हे गुरूवर !
भगवान ने आपको
दो आंखें मुफ्त में दी,
ऊपर से आपने
लालटेन भी लगा ली ।
पर आप ये न समझ पाये
कि मैंने चाकू
प्रश्नपत्र पर क्यूं गाड़ा है ।
हे विद्यानिधि !
आपके पंखे में रेग्युलेटर नहीं है ।
ये तीन पंखों की चिरईया
फुल स्पीड पर फड़फड़ा रही है ।
मेरा प्रश्न पत्र
इसकी तीव्र वायु से
उड़ा जा रहा था ।
अतः
मैंने इसकी लाश पर
चाकू गाड़ कर
इसको उड़ने से वंचित कर दिया है ।
और कोई बात नहीं
ये तो मात्र पेपरवेट है ।

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