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शनिवार, 18 नवंबर 2017

रावण जीत गया


लंका की लड़ाई में राम ने रावण को बाणों से छलनी करके धरती पर लिटा दिया । तब राम को याद आयी कि महाबली रावण महापंडित भी है और उससे ज्ञान गुण की बातें सीखी जा सकती हैं ।

भगवान राम ने अनुज लक्ष्मण को रावण से कुछ शिक्षा हासिल करने के लिये उसके पास भेजा । लक्ष्मण बड़ी अनिच्छा से रावण के सिरहाने जा खड़े हुये । उन्होने कहा कि मैं भाई की आज्ञा से तुम्हारे पास आया हॅू । तुम मुझे कुछ सीख देना चाहते हो तो बोलो ।

रावण कुछ नहीं बोला । लक्ष्मण निराश लौट आये । तब राम ने कहा कि जिससे कुछ सीखने की गरज होती है, उसके चरणों के पास खड़े होना चाहिये । किसी के सिर पर सवार होकर उससे विद्या नहीं ली जा सकती । लक्ष्मण ने भूल सुधारी वे रावण के चरणों में जा खडे़ हुये । रावण ने उन्हें नीति सीखायी फिर मुस्कुरा कर बोला ‘‘अपने भाई से जाकर कह देना । वें इस लड़ाई में हार गये हैं । जीत मेरी हुयी है । अगर उन्हें मेरी बात झूठ लगे तो वे कलयुग में रामलीला और भारतीय संसद का निरीक्षण कर लें । अगर वहां  मेरी जीत का डंका न बज रहा हो तो मैं अपनी पराजय स्वीकार कर लूँगा ।

भगवान राम भारत देश में विजय दशमी समारोह देखने निकले । सड़कों पर लाखों लाउडस्पीकर चीख रहे थे । मंदिरों में बड़े बड़े भोंपू भक्तों का कान फाड़ रहे थे । भगवान राम को लंका का युद्ध याद आया । उन्हे लगा कि रावण इन भोंपुओं के जरिये अपनी विजय का दर्पघोष कर रहा है ।

भगवान राम संसद में पहुॅचे । वहाँ  सारे सम्मानित सांसद माइक्रोफोन फेक कर जोर जोर से गरज रहे थे । अध्यक्ष महोदय बेहाल थे। सदन बदहाल था। भगवान राम को लगा कि रावण की सेना गरजती चली आ रही है ।

भगवान के माथे पर पसीना आ गया । लंका की लड़ाई में भी पसीना नहीं आया था। वे ठगे से खड़े रह गये। ससंद में सभी लोग रामराज्य की कसमें खा रहे थे । देश में सभी महापुरूष राम की दुहाई दे रहे थे, लेकिन वे काम रावण का कर रहे थे । चारों तरफ रावण की जीत के डंके बज रहे थे । राम ने अपना धनुष रख दिया । वे बोले – रावण तुमने ठीक ही कहा था ।जीत मेरी नही तुम्हारी हुयी है ।

नरेश मिश्र

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