काम ऐसे करो कि लोग आपको….

किसी दूसरे काम के लिए बोले ही नहीं….

बुधवार, 22 नवंबर 2017

कल की बात पुरानी : भाग -1


पृथ्वी पर तीन रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित । लेकिन मूर्ख लोग पत्थर के टुकडों को ही रत्न कहते रहते हैं ।

– संस्कृत सुभाषित

 

बहुत समय पहले की बात है । मतलब कि प्रचीन काल की बात है । कर्कट वन नाम का एक जंगल था । कर्कट वन कंटीले पेड़ों और झाड़ियों से भरा रहता था । जहाँ देखो बबलू, नागफनी, बेल आदि । इसकी एक वजह भी थी कि उस इलाके में पानी कम बरसता था । कर्कट वन शायद राजस्थान के किसी इलाके में पड़ता होगा । तो उस वन में पानी की कमी के कारण कंटीले पेड़ पौधे इफरात में पाये जाते थे । कर्कट वन के आस-पास कोई नदी नहीं बहती थी और पानी के स्रोत भी इक्का-दुक्का थे । उसी कर्कट वन में एक ऋषी-मुनी का भी आश्रम था जो कि उस वन के एकमात्र पानी के स्रोत, एक बड़े तालाब के किनारे स्थित था । वह तालाब कर्कट वन के सभी पशु पक्षियों की प्यास बुझाता था । यहाँ तक कि सूखे के मौसम में वन के आस पास के गॉवों के लोग भी इस तालाब से अपनी जरूरतभर पानी ले जाया करते थे । हॉ तो, उन ऋषी की जिनकी लंबी सी सफेद रंग की जटा और दाढ़ी थी,सभी लोग आदर और सम्मान से उनको बकबकिया बाबा पुकारते थे । गॉव के गंवार लोग, साधु की बड़ी बड़ी बात समझ नहीं पाते नहीं थे । लेकिन बकबकिया ऋषी भी पहुंचे हुए ज्ञानी थे । उनका आस पड़ौस के राजाओं में बड़ा प्रभाव था । सभी राजा लोग उनके ज्ञान का सम्मान करते थे और अपने-अपने नालायक लौंडों को उनके आश्रम में पठन पाठन के लिए भेजा करते थे, जिससे कि कम से कम कुछ समय के लिए तो प्रजा चैन की सांस ले सके और राजाओं के हरम में आयीं युवा राजकुमारियों को भी नये-नये ऑप्शन न अवलेबल हो सकें, जो भी बात रही हो, खैर ।

 

तो कर्कट वन में बकबकिया मुनि की अच्छी ऐश कटती थी । राजाओं के एक नंबर के आवारा लौंडों के लिए वो सरकारी पैसों से बोर्डिंग स्कूल चलाते थे । आश्रम का काम करने के लिए फ्री में शाही नौकर एवलेबल रहते थे । सुबह दातून के लिए नीम की लकड़ियाँ तोड़ने से लेकर रात में पैर दबाने और पीठ कचरने तक के लिए लंठ राजकुमारों की फौज तैयार रहती थी । कर्कट वन के आस पास रहने वाले लोग जब तालाब पर पानी लेने के लिए आया करते तो बकबकिया ऋषी के लिए दान में अन्न वगैरह ले आया करते थे । राजा लोग भी जब तब आकर उनको अन्न, दुधारू गायें, हीरे-जवाहरात आदि भेंट में चढ़ा जाया करते थे । कुल मिलाकर बकबकिया ऋषी को किसी चीज की कमी नहीं थी ।

 

हाँ, गाँव के लोग उनको बकबकिया साधु इस लिए कहते थे क्योंकि बकबकिया महाराज संस्कृत के सुभाषितों के बड़े भारी ज्ञाता थे । मार सुभाषित रट डाले रहिन । जब देखो तब सुभाषित ही उनके मुखारविंद से टपकता रहता । जैसे सचिन तेंदुलकर खाते, पीते, सोते, जागते, उठते, बैठते सिर्फ क्रिकेट ही सोचते हैं, वैसे ही बकबकिया महाराज भी हर वक्त सुभषियाते रहते थे । किसी राजकुमार को डांटना हुआ तो सुभाषित, किसी को समझाना हुआ तो सुभाषित, किसी से काम करवाना हुआ तो सुभाषित, किसी को काम से हटाना हुआ तो सुभाषित । राजा महाराजा भी उनके सुभाषित ज्ञान से हड़के रहते थे । तो मित्रों, बकबकिया महाराज की असली पूंजी उनके सुभाषित थे । सो एक दिन रात को हचक कर देशी घी की पूरियाँ कोहड़े की सब्जी से हुरने के बाद डेढ लीटर काजू बदाम की खीर सरपोटने के पश्चात वो कौड़िहार राज्य के राजकुमारों से अपने हाथ पैर मींजवा रहे थे । नीम के तिनके से अपने बुध्दि दांत में फंसे हुए बादाम के टुकड़े को निकाल कर उन्होंने एक लंबी जम्हाई ली, फिर अपनी सफेद दढी पर हाथ फैरते हुए अपने आप से कहा –पृथ्वी पर तीन रत्न हैं जल, अन्न और सुभाषित । लेकिन मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते रहते हैं ।

तो मित्रों सैंकड़ों-हजारों साल पहले बकबकिया महाराज का काम जल, अन्न और सुभाषित से ही चल जाया करता था । इसीलिए उन्होंने रत्नों को पत्थर का टुकड़ा कह कर दुत्कारा था । लेकिन आज आपको तो पता ही है कि ”नक्षत्र” डायमंड शो रूम में डायमंड के क्या भाव चल रहे हैं । एक पांच रत्ती का पीला पुखराज या नीलम या माणिक या पन्ना लेने जाईये तो भाव सुन कर पर्सनल लोन लेने का मन करने लगता है । अब बकबकिया महाराज तो ठहरे ब्रह्मचारी । जोरू जात का कोई चक्कर नहीं । आज के जामाने में अगर ”तनिष्क” के शो रूम में चढे होते तो सोने का भाव देख कर कमण्डल भर भर के पानी पीते और पानी पी-पी कर इस मंहगाई को गरियाते ।

रत्नों को छोड़िये आज तो पत्थर भी रत्नों को मुंह चिढाते हैं । अगर आज आपके पास 5 बीघे जमीन किसी पहाड़ी पर है तो एक क्रेशर लगा लीजिए और सारी गिट्ठी सरकार को रोड बनाने के लिए सप्लाई कर दीजिए । दिन भर में 10 ट्रक गिट्ठी भी निकली तो भी आप साल भर में पांच दस करोड़ तो कमा ही लेंगें ।

तो मित्रों वक्त के साथ सूक्तियों के भी अर्थ बदल जाते हैं, जेई लिए कहता हँू कि छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी ।

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कल की बात पुरानी : भाग -1

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