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शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

नरक यात्रा

“नरक यात्रा” एक व्यंग्य उपन्यास है ज्ञान चतुर्वेदी जी का । ज्ञान चतुर्वेदी जी पेशे से डॉक्टर हैं और वह भी दिल के डॉक्टर । मेरे अनुसार वर्तमान समय के वे सर्वोच्च व्यंग्य लेखक हैं क्योंकि जिन व्यंगकारों को मैं जानता हूँ वो सबके सब स्वर्गवासी हो चुके हैं । ज्ञान चतुर्वेदी जी के लगभग सभी उपन्यास मेरी लाईब्रेरी में हैं, उनके कई व्यंग संग्रह भी मेरे पास हैं और व्यंग कॉलम “प्रत्यंचा” भी मेरे पास है लेकिन उनकी लिखी जो सबसे बेहतरीन किताब मुझे लगती है तो वह है “नरक यात्रा” ।

आपने बचपन में या जीवन में कभी न कभी कॉमिक्स जरूर पढ़ी होगी । न पढ़ी होगी तो अखबार में या किसी मैगजीन में आपने कुछ ब्लॉक्स कॉमिक्स के पढ़े होंगे । कॉमिक्स की एक विशेषता होती है । एक ब्लॉक में कई कार्टून ड्रा किये गये होते हैं और उनकी भाव भंगिमा देख कर हंसी या मुस्कुराहट चेहरे पर आ जाती है । पर क्या कभी आपने ऐसा गद्य पढ़ा है जिसमें कोयी चित्र न हो पर उसे पढ़ते वक्त आपके मन मस्तिष्क में अपने आप ही कार्टून ड्रा होने लगें या कार्टून फिल्म चलने लगे। यह जरूर चकित कर देने वाला गद्य होगा । ऐसा लेखन मेरी जानकारी में दो लेखक ही कर पायें हैं । एक हैं श्री नरेन्द्र कोहली जी, आप उनका व्यंग उपन्यास पढ़ें “पांच एब्सर्ड उपन्यास” और दूसरे हैं ज्ञान चतुर्वेदी जी का उपन्यास “नरक यात्रा” ।

“नरक यात्रा” व्यंग उपन्यास सरकारी अस्पताल पर किया गया एक बेजोड़ व्यंग है और क्योंकि यह व्यंग न सिर्फ लिखा गया है बल्कि चित्रित किया गया है तमाम बिंबों के सहारे इसलिये इसे पढ़ते समय ऐसा लगेगा कि आप कोयी कार्टून फिल्म पढ़ रहें हैं न कि देख रहे हैं । एक सरकारी अस्पताल पर एक डॉक्टर द्वारा किया गया व्यंग । पूरे अस्पताल के माहौल का पोस्टमार्टम करके रख देता है यह उपन्यास । मुझे तो ज्ञान जी डॉक्टर कम और व्यंग लेखक ज्यादा मालूम पड़ते हैं क्योंकि मैं जिस पेशे से जुड़ा हूँ उस पेशे पर व्यंग लिखना ईशनिंदा के समान माना जाता है, एक तरह से कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट लेकिन यहॉं तो एक डॉक्टर निर्ममता से अपने कार्यस्थल का चीरहरण कर देता है । वह सरकारी अस्पताल के ऊपर पड़े हुये एक मात्र वस्त्र कफन को भी हटा कर सिस्टम की नंगी बदबूदार लाश को पाठक के सामने उघाड़ देता है । ऐसा कलेजा अगर ज्ञान चतुर्वेदी जी के सीने मे हैं तो वाकई वो बधाई के पात्र (डॉक्टर) हैं ।

जैसा कि मैंने बताया कि उपन्यास पढ़ते वक्त आपके मन मस्तिष्क में एक कार्टून मूवी चलना शुरू हो जायेगी । इसका उदाहरण देने के लिये आप सिर्फ ये चार पंक्तियों पर गौर फरमायें जो कि उपन्यास शुरू होने के पहले ही अंदर के बारूद की झलक दे देती हैं ।
“इस मेडिकल कालेज अस्पताल में सुबह बीमारों की तरह दाखिल होती है । अस्पताल के बरामदे से देखो तो ‘सुबह’ मानो मेडिकल की किताब का एक चैप्टर सा खुल गया लगता है । सूरज मानो पका हुआ लाल फोड़ा, धूप जैसे गाढ़ी मवाद, हवा मानो कृत्रिम श्वास और उसमें हिलते वृक्ष मानों बड़े डॉक्टर की गतल डायग्नोसिस पर सिर हिलाता जूनियर डाक्टर । न कलरव करते पक्षी, न सूर्योदय का वह उदात्त अनुभव । बस कूलती, कराहती सी सुबह । रात का ही एक्सटेंशन सा ।”

उपन्यास का नाम है “नरक यात्रा” और वाकई यह उपन्यास आपको नरक यात्रा पर ले जाता है । वह नरक है एक आम आदमी के लिये सरकारी अस्पताल मे इलाज कराने का नर्क । यहॉं पग पग पर भ्रष्टाचार का समंदर लहरा रहा है । डाक्टरों की आपसी कलह और उनमें भी नीम हकीम टाइप डाक्टर जो खुद भ्रमित हैं कि मरीज को क्या हुआ है और मरने वाला कॉलरा से मरा की अपेन्डिस से या पेट में तौलिया छूट जाने से । ज्ञान जी बेहिचक एक सर्जन डॉक्टर की तरह सरकारी अस्पताल में फल फूल रहे भ्रष्टाचार के कैंसर की लंबी सर्जरी कर डालते हैं ।Surgeon

हर सीन में आपको एक लाचारगी दिखेगी क्योंकि यह एक सरकारी अस्पताल है । साथ ही शुरू से लेकर अंत तक पसरा हुआ एक लंबा मनहूस, गमगीन सा माहौल मिलेगा लेकिन इस मायूस कर देने वाले माहौल में अगर आप मुस्कुराते हैं तो यह ज्ञानजी की लेखनी का कमाल है । तारीफ करनी होगी ज्ञान चतुर्वेदी जी की ……………उनके जितने भी व्यंग उपन्यास मैंने पढ़े हैं सब में एक समानता है । सभी व्यंग उपन्यासों का बेकग्राउंड , मूल विषय दुख है, गरीबी है, पीड़ा है, मौत है । चाहे वह “नरक यात्रा” हो या फिर “बारामासी”, “मरीचिका” या फिर “हम न मरब” । हर उपन्यास में वह मृत्यु जैसी खौफनाक चीज से अपनी व्यंग लेखनी के सहारे मोर्चा लेते रहते हैं । “नरक यात्रा” जो कि नाम से ही एक खौफ और पीड़ा को रिफलेक्ट करती है लेकिन जब आप इसे पढ़ेंगे तो पायेंगे कि वाकई अगर व्यंगकार ज्ञान चतुर्वेदी जैसा हो तो वह मृत्यु पर हंस सकता है, हंसा सकता है । “नरक यात्रा” को राजकमल प्रकाशन ने छापा है और पेपर बैक में तकरीबन दो-ढाई सौ रूपये में यह आपकी हो सकती है । उपन्यास के कुछ अंश नीचे दे रहा हूँ ।

बड़े हस्पतालों के विषय में जो लोग थोड़ा बहुत भी जानते हैं, वे राउंड नाम की चीज़ से परिचित होंगे. इसके बिना चारा भी नहीं. राउंड एक समारोह है, जिसके अंतर्गत एक बड़े डाक्टर के साथ पाँच दस जूनियर डाक्टर हर मरीज़ की जांच करके, उसकी मृत्यु क्यों नहीं हो रही, या यह ठीक कैसे हो गया इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं.

राउंड वास्तव में एक परिक्रमा है दो सो गज की बाधा दौड़ है, बड़े साहेब की झांकी है, जिसे मरीजों के बीच घुमा कर चाय की प्यालियों में विसर्जित कर दिया जाता है. राउंड का मतलब है गोल, चक्राकार.कुछ गोल है, गोलमाल है. राउंड एक चक्र है, चक्कर है, घनचक्कर है. राउंड वास्तव में आध्यात्म की चीज़ है, जितना इसकी तह में जाओगे, वैराग्य की तरफ़ झुकते जाओगे. राउंड का अर्थ है गोल, शून्य, ना कुछ. शून्य है सब.कोई कीमत नहीं, पर फ़िर भी हस्पताल के गणित की एक आवश्यक संख्या.
चौबे जी का राउंड लेने का अपना तरीका था, जिसे भारत सरकार ने मौलिक आविष्कार होने के बावजूद अभी तक कोई पुरस्कार नहीं दिया था. वे मरीज़ से लगभग तीन फिट की दूरी कायम रखकर उसकी जांच किया करते थे. वे दूर से ही पहले नंबर के बेड वाले मरीज़ से पूछते की कहो भाई, क्या तकलीफ है, और जब तक वो बतलाता की पेट में दर्द है, तब तक चौबे जी पाँचवें मरीज़ को तीन फिट की दूरी कायम रखते हुए बतला रहे होते की उसकी पेचिश का राज मलेरिया है.

Doctor_runs
डा. चौबे भागते हुए राउंड लेते. मरीज़ की बात सुनने का समय उनके पास नहीं था. वे मरीज़ को देखने में इतने व्यस्त थे की मरीज़ देखने का समय उनके पास नहीं था. वे एक पलंग से दूसरे पलंग तक तेज़ दौड़ते, फ़िर बिस्तर पर छलांग मारकर बाधा क्रास करते और फ़िर दौड़ते. वे चिकित्सा विज्ञान की पी.टी. उषा थे.वे मरीजों के समुन्द्र के ऊपर उड़ने वाले पवन पुत्र की तरह आते. वे सट से आते और फट से वार्ड से निकल जाते.
बंगला देश के तूफ़ान की तरह आते. पहले मरीज़ के पास ही मानो रेस की सिटी सी बजती और डाक्टरों का पूरा काफिला दौड़ता हुआ मरीजों के पास से, सामने से, पलंग के नीचे से, खटिया के ऊपर से निकल जाता. एक दम भगदड़ सी मच जाती. सभी डा.चौबे के पीछे भागते, दौड़ते, उड़ते तथा घिसटते थे.

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