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रविवार, 19 नवंबर 2017

पापा पापा ये चुनाव क्या होता है

=>क्यूं पापाजी वोट डाल आये ।

   =>बेटा! पता नहीं वो तेरा कौन सा बाप है जो मेरे जाने से पहले ही मेरा वोट डाल आता है ।

 

हिंदुस्तान में साल भर में आम तौर पर चार मौसम आते हैं । सर्दी, गर्मी, बरसात और कभी-कभी वक्त मिला तो बसंत भी आ सकता है । पर इधर जब से डेमोक्रेसी जोर मारने लगी है और कांग्रेस सत्ता के पतझड़ से पीड़ित हुई है । हमारे देश में एक पांचवा मौसम आने लगा है । चनाव का मौसम । चुनाव का मौसम आमतौर पर चुनाव का मौसम होता है । इस मौसम की तुलना आप चारों मौसमों से कर सकते हैं । इस सीजन में कुछ लोगों को कड़ाके की सर्दी लगती है जब जमानत जब्त होने की पक्की खबर हो । कुछ लोगों को बेमौसम की लू लगने लगती है जब ये पता चले कि माधोपुरा वाले डेढ़ लाख की दारू पाने के बाद वोट चमन सिंह को पीट आये । किसी की बेमौसम की बरसात में सारी लहलहाती फसल चौपट हो जाती है और घर का छप्पर गिर पड़ता है जब बूथ कैप्चरिंग करवाकर सीट पक्की होने की खुशी में मुर्गे कट रहे हों और निर्वाचन आयोग रिपोलिंग का ऐलान कर दे । और बसंत की खुशियां तो मनाई ही जाती हैं जब सारी विरोधी पार्टियाँ चुनाव में  धांधली का आरोप लगा रही हो और श्रीमान धोतीपकड़ कुशवाहा (उपाध्याय, पटेल,  सिसोदिया या जो भी हो) लोक सभा में माईक उखाड़ने का प्रशिक्षण लेने के लिये क्षेत्र की जनता (अपने वो प्रिय सखागण जिन्होंने बूथ कैप्चरिंग में हार्दिक सहयोग दिया था) की ओर से लोक सभा को अर्पित किये जाते हैं ।

मेरा दस वर्षीय बेटा दूरदर्शन पर ‘आपका फैसला‘ देखते-देखते बोर हो गया तो उसके बालमन में उन स्वाभाविक प्रश्नों की झड़ी लगा दी जिनका उत्तर देना एक आम हिंदुस्तानी के बस की बात नहीं है । हमारे कुलदीपक पूछते जा रहे थे और हम अपनी व्यवहारिक बुध्दि की मदद से नई परिभाषाआे का सृजन करते जा रहे थे।

‘पापा पापा‘ ये चुनाव क्या होता है ?

मैं चकित रह गया । इसको न तो अभी मताधिकार प्राप्त हुआ है और न ही ये इंकमटैक्स देता है फिर क्यों परेशान हो रहा है । पर फिर भी मैंने जैसे-तैसे

जवाब देना मुनासिब समझा क्योंकि चुप रहने पर वह मुझे मूर्ख पिता समझता ।

”बेटे जब हमारे नतागण बैठे बिठाये बोरियत महसूस करने लगते हैं और उनको  लगता है कि देश में कुछ नहीं हो रहा है और कुछ होना चाहिये अन्यथा देश

रसातल में चला जायेगा । इसलिये वो देश की उन्नति के लिये पहले एक जुट हो  कर सरकार गिराते हैं और फिर चुनाव करवाते हैं । इससे उनकी बोरियत मिट जाती है और देश तरक्की की राह पर सरपट भागने लगता है । पर असल में होता यह है कि उन नेताओं को अपनी ब्लैक मनी निकालने का मौका मिलता है । जिससे देश में बेरोजगारी की समस्या कुछ दिनों के लिये हल हो जाती है क्योंकि अधिकांश बेरोजगार उन प्रात: स्मरणीय नेताओं का दिहाड़ी पर टैंपो हाई करते हैं और उन्हीं बंदनीय तपोपूतों के नोटों से रात्रि भोजन और सुरमयी सुरा का पान करते हैं ।”

‘पिता जी हम चुनाव किसका करते हैं और क्यों करते हैं ?’

”पुत्र! चुनाव एक स्वयंवर की तरह होता है । जिसमें जनता के हाथ में वरमाला होती है । सारे नेता सज संवर के राजकुमारों की तरह आते हैं पर जनता राम के धोखे में रावण को ही वरमाला पहना देती है । पर असल में राम वहाँ कोई नहीं होता है । सारे रावण राम का मेकअप कर के घूम रहे होते हैं । राम को तो स्वयंवर हाल में घुसने ही नहीं दिया जाता है । अगर किसी तरह वह आ भी जाये तो उसके फटे-चिथड़े कपड़ों, बढ़ी हुये बाल, मिट्टी में लिथड़े जूतों को देख कर जनता वरमाला लिये हुये आगे बढ़ जायेगी।‘

‘चुनाव क्यों करते हैं? इसका सीधा सा उत्तर है कि हर कुंवारी जवान लड़की का सपना होता है अपना सुंदर सा घर बसाने का । प्यारा सा गृहस्थी चलाने वाला पति पाने का । वो पति जो उसके सुख दुख का साथी होता है। उसका सहारा होता है । पर उसको मिलता है एक कामचोर, जुआरी, शराबी पति जो उसको मारता-पीटता है । उसके गहने बेच खाता है और जुंए में अपनी बीवी को भी दाव पर लगा देता है ।”

‘डैड ये वोट क्या चीज होती है ?’

”डियर सन ! ये वोट ही हमारी वरमाला होती है । पिछले तीन बार से मेरा वोट मेरे जाने के पहले ही पड़ जाता है । तेरी मम्मी का तो वोटर लिस्ट में नाम ही नहीं है ।”

”हे तात ! ये प्रजातंत्र क्या है ?”

”वत्स ! जब संविधान रचा गया था तब इसका मतलब था एक ऐसा तंत्र जो प्रजा के द्वारा संचालित हो । यानि जनता की, जनता के लिये, जनता के द्वारा चुनी गयी सरकार । पर धीरे-धीरे इसका मतलब नेता की, नेता के लिये, नेता के द्वारा और फिर गुंडों की, गुंडों के लिये और गुंडों के द्वारा चुनी गई सरकार हो गया और अब ये दलालों की, दलालों के द्वारा और दलालों के लिए चुनी गई सरकार हो गया है।”

”बापू ! ये हर साल चुनाव क्यों होता है ?”

”लल्ला ! क्योंकि हर साल तलाक हो जाता है । इसलिये दुबारा विवाह करना पड़ता है ।”

”अब्बू ! ये वोट क्या चीज होती है ?”

”बेटा जान ! हिंदुस्तान के आधे से अधिक वोटर दारू की बोतल, सौ के नोटों, ब्लाउज, पेटीकोट के कटपीस दे देने पर वोट दे देते हैं । बहुत से वोट लाठी, बंदूक से पड़ जाते हैं । कई नेता बैलेट बॉक्स और मतपत्रों का खुद ही निमार्ण करके गिनती करवा देते हैं । बाकी जो वोटर बचते हैं वो जाति, धर्म, क्षेत्र देख कर वोटिंग करते हैं । मात्र कुछ प्रतिशत ही बुध्दि का प्रयोग करते हैं । यहाँ युध्द चुनाव जीतने के लिये लड़ा जाता है और चुनावी हिंसा में युध्द से ज्यादा आदमी मारे जाते हैं । दो दर्जन पार्टियाँ चुनाव लड़ने के लिये सिर्फ एक नीतिगत एवं सैध्दांतिक समझौता करती हैं कि सत्ता में आने पर सब मिलकर खायेंगे । बरहाल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव ऐसे ही होते हैं ।”

सामने बैठे कुलदीपक अचानक उठ कर खडे हुये और यह कहते हुये कि पापा आपकी बात समझ में नहीं आ रही है बाहर क्रिकेट खेलने चले गये । बेटा यह हमारे लोकतंत्र की अकाटय गुगली है जो बाउंसर से भी ज्यादा खतरनाक है ।

” आज हमारे ऊपर गोरे राज कर रहे हैं । कल काले राज करेंगे । ”

– शहीदे आजम सरदार भगत सिंह

”वो देश को उपनिवेशवाद  के सलाद के साथ खाते थे । ये लोकतंत्र के अचार के  साथ खाते हैं । ”

– स्वहरिशंकर परसाई

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