काम ऐसे करो कि लोग आपको….

किसी दूसरे काम के लिए बोले ही नहीं….

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

हास्य नाटक : हरफनमौला मुंशी इतवारीलाल

दृश्य: 1 – घर के भीतर का सीन

(मुंशियाइन की आवाज दूर से आती है )
मुंशियाइन: अजी, मैंने कहा, सुनते हो !
(कोई उत्तर नहीं मिलता । नाक बजने की आवाज । मुंशीजी कुर्सी पर बैठे बैठे सो रहे हैं ) 
मुंशियाइन : ओफ्फोह, नाक मे दम आ गया, इस नक्की सुर से ! सूरज आसमान पर चढ़ आया, लेकिन मुंशीजी की प्रभाती बंद नहीं हुई । (चीख कर) अजी ! सुनते हो । 
मुंशीजी : सुनता था, लेकिन अब नहीं सुन सकता ।
मुंशियाइन : (तुनककर) क्यों अब क्या हो गया ।
मुंशीजी : कान जब्त हो गये । पर्दा फट गया ।
मुंशियाइन : अच्छा जी !
मुंशीजी : हॉं जी, जरा सुनूँ तो किस दुश्मन की शामत आ गई, जो सुबू-सुबू एटम बम का धमाका बरपा कर रही हो ।
मुंशियाइन : अच्छा जी, मेरी आवाज एटम बम का धमाका है, क्यों ।
मुंशीजी : और मेरी नाक शहनाई है क्यों ।
मुंशियाइन : मैंने कब कहा की शहनाई है ।
मुंशीजी : शहनाई नहीं होगी तो क्लोरनेट होगी । अभी आप ही तो प्रभाती के सुर सुन रही थीं, भगवान के फजल से ।
मुंशियाइन : तुम सुना रहे थे इसलिये सुन रही थी । क्या तुम जानते नहीं कि आज इतवार है ।
मुंशीजी : नहीं जानता था, भगवान के फजल से बिल्कुल नहीं जानता था । मेरी क्या बिसात, अभी वलायत वाले भी इस नई खोज के बारे में कुछ नहीं जानते होंगे कि हफ्ते के छः दिन बीतने पर सातवॉं दिन इतवार होता है ।
मुंशियाइन : अरे, आज तुम्हारे जनमदिन का इतवार है ।
मुंशीजी : ओह! तो आज इतवारी छाप इतवार है, क्यों । आहा, हा, हा । कितना शानदार था वह दिन, जब हम धरती पर आये थे भगवान के फजल से ।
मुंशियाइन : जी हॉं, बहुत शानदार था वह दिन । ससुर जी कहा करते थे कि उसी दिन भूकम्प आया था और शहर की आधी से ज्यादा इमारते गिर पड़ी थीं । 
मुंशीजी : गिर नहीं पड़ी थीं, मुंशी इतवारीलाल के हुजूर में आदाब बजा लायी थीं । खैर छोड़ो इन बातों को । आज तो हमें अच्छी सी दावत खिलाओगी न ! 
मुंशियाइन : खिलाऊंगी, पर तुम अपना वादा पूरा करोगे न ।
मुंशीजी : वादा………..कौन सा वादा ।
मुंशियाइन : इतनी जल्दी भूल गये । जनम दिन पर मुझे नेकलेस पहिनाने को कहा था । 
मुंशीजी : ओ नेकलेस ……हॉं हॉं कहा था, पर मैं तो गलती से हीरे की अंगूठी ले आया । अभी कल ही तो…
मुंशियाइन : (बात काटकर) अंगूठी ……….हीरे की !
मुंशीजी : जी हॉं, इसमें चौंकने की क्या बात हुयी । खूंटी से जरा अचकन तो उतारो । अभी देता हूँ तुम्हें ।
मुंशियाइन : यह लो अचकन, लेकिन यह अंगूठी तुम………
मुंशीजी : बातचीत मत करो । यह लो पहनो तो । जरा देखूं तो तुम्हारी उंगली पर फबती है या नहीं भगवान के फजल से ।
मुंशियाइन : खूब फबती है……..यह अंगूठी तो बहुत शानदार है ।
मुंशीजी : मैं क्या कम शानदार हूँ । मुंशी इतवारीलाल को क्या ऐरा गैरा नत्थू खैरा समझ लिया है ।
मुंशियाइन : पर मैंने तो हल्का फुल्का नेकलेस लाने को कहा था, भला तुमने इतना पैसा क्यों खर्च किया ।
मुंशीजी : क्या करता, मजबूरी थी । सेठ के यहॉं नकली नेकलेस तैयार नहीं थे भगवान के फजल से । 
मुंशियाइन : (चीखकर) क्या ………यह अंगूठी नकली है ।
मुंशीजी : न न नकली । हॉं हॉं ……….न ……….न……नहीं जी ! 
मुंशियाइन : समझ गयी । यह लो अपनी सौगात । किसी और को फुसलाने के काम आयेगी ।
मुंशीजी : दे…..दे……..देखिये ! यह मेरी सरासर तौहीन है भगवान के फजल से । 
मुंशियाइन : (बिफरकर) मेरा सिर मत चाटो । जी चाहता है कि मायके चली जाऊॅं और जनम भर तुम्हारी सूरत न देखूं ।
मुंशीजी : यह धमकी दे रही हैं आप ।
मुंशियाइन : हॉं हॉं धमकी दे रही हूँ ।
मुंशीजी : इसका वादा नहीं कर सकतीं ।
मुंशियाइन : कैसा वादा ।
मुंशीजी : यही की आप मायके चली जायेंगी और जनम भर मेरी सूरत नहीं देखेंगी भगवान के फजल से ।
मुंशियाइन : (तुनककर) हॉं हॉं, यही तो चाहते हो तुम, ताकि मेरे बाद मेहनत से जमाई मेरी गिरस्ती को घुड़दौड़ का मैंदान बना दो । सुन लो कान खोलकर, मैं तुम्हारी छाती पर पीपल बन कर रहूंगी । 
मुंशीजी : सु…सु… सुनता हॅू । मगर आप अपनी जगह पर खड़ी रहिये । इस तरह मेरी तरफ क्यों बढ़ी आ रही हैं भगवान के फजल से ।
मुंशियाइन : तुम्हारी तरफ नहीं, मैं दरवाजे की तरफ जा रही हॅू ।
मुंशीजी : दरवाजे की तरफ ! मगर अभी आपने ही तो मायके जाने का प्रोग्राम रद्द कर दिया था ।
मुंशियाइन : मायके नहीं मैं डाक्टर के यहॉं जा रही हॅू । मुन्ने के लिये खांसी की दवा लानी है ।

दृश्य: 2 – मैदान का सीन

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मुंशीजी : अहा …! अहा ,कनकौवे हैं या रंगबिरंगे परिंदे । सारा आसमान ढंक गया । अब लगता है कि आज इतवार है । (पुकार कर) बाबूलाल जी कैसे मिजाज हैं ।
बाबूलाल : मेहरबानी है मुंशीजी, आज तो शर्ती लड़ा रहा हॅू । 
मुंशीजी : क्यों नहीं, क्यों नहीं । बाबूलाल जी, आप तो शातिर कनकौवेबाज हैं भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : मैं क्या हूं मुंशीजी, बस आपका ही शागिर्द हॅू । पांच पतंगे कट चुकीं, छठी उड़ा रहा हॅू । 
मुंशीजी : देखिये, डोर सम्हालिये । मेरे शागिर्द की पतंग कट नहीं सकती । आप तो अनाड़ियों की तरह ठुनके दे रहे हैं । 
बाबूलाल : हवा नहीं लगती, इसलिये ठुनके दे रहा हॅू मुंशीजी, वर्ना अपना कानकौवा किसी बाज से कम नहीं है।
मुंशीजी : कनकौवा तो बाज है, पर कनकौवेबाज, माफ कीजियेगा, पिद्दी भी नहीं है भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : क्या क्या कहा ।
मुंशीजी : सम्हालिये, पेंच पड़ी जा रही है बाबूलाल जी ।
बाबूलाल : मैं देख रहा हॅू मुंशीजी ।
मुंशीजी : देख क्या रहे हैं । आप घट पर हैं, फिर भी खींचे जा रहे हैं । ढील दीजिये भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : कैसे ।
मुंशीजी : हटिये, डोर मुझे दीजिये । आप लटाई पकड़िये । हॉं, ये लीजिये पकडिये । मेरा मुंह क्या ताकते हैं । 
बाबूलाल: अरे ……… आप ने तो.
मुंशीजी :(डपट कर) खामोशी से लटाई पकड़िये । मेरा सर मत चाटिए । देखिए, अभी चुटकी बजाते काट देता हूं ।
बाबूलाल : पर मैं तो शर्ती लड़ा रहा था । 
मुंशीजी : लड़ा नहीं रहे थे, झक मार रहे थे । देखिए, मैं बात की बात में काटता हॅू सारी पतंगे । क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : मुंशीजी !
मुंशीजी : मैंने कनकौवेबाजी में रियासत बिगाड़ दी । ये दो कौड़ी के पतंगबाज क्या खाकर मुकाबला करेंगे मेरा ।
बाबूलाल : मुंशीजी सम्हालिए, वह पतंग आ गयी ।
मुंशीजी : हुंह ! पतंग नहीं गोया बम आ रहा है । अभी एक भिड़ंत में खींच कर छत पर गिरा दूंगा भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : मुंशीजी पतंग कट गयी डोर सम्हालिए ।
मुंशीजी : आं….आं… कट गयी ।
बाबूलाल : जी हॉं, आंख खोलकर देखिए । कट गयी ।
मुंशीजी : मगर कैसे बाबू बाबूलाल जी ।
बाबूलाल : (गुस्से से) मेरी बेवकूफी से और कैसे । हटिये, वर्ना मेरी सारी डोर लुट जायेगी ।
मुंशीजी : आपका मंझा बोगस था, वर्ना मेरे हाथों पतंग कट जाये………..मुंशी इतवारीलाल के हाथों से ……..नामुमकिन !

दृश्य: 3 – कमरे का दृश्य

सतीश और पंडित जी ताश खेल रहे हैं और मुंशी इतवारी लाल पीछे खड़े हो कर देख रहे हैं.

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सतीश : नामुमकिन ! पान का बादशाह कट चुका है । वह फिर कैसे मिल गया आपको ।
मुंशीजी : एक बादशाह कट गया तो दूसरा गद्दी पर बैठा होगा भगवान के फजल से ।
सतीश : दूसरा नहीं, यहॉं तो पण्डितजी हाथ की सफाई से फिर उसी को जिन्दा कर रहे हैं ।
मुंशीजी : बरहमन हैं बरहमन । संजीवनी बूटी दे दी होगी बादशाह को ।
पंडित जी : सतीश बाबू ! आप व्यर्थ ही संदेह कर रहे हैं ।
सतीश : और आप धरम का ठेका लेकर भी झूठ बोल रहे हैं पंडित जी ।
मुंशीजी : धरम का ठीका मंदिर में लिया जाता है, आप के बैठके में नहीं, क्यों पंडित जी ।
पंडितजी : सतीश बाबू हार गये तो रो रहे हैं मुंशीजी !
मुंशीजी : हारें सतीश बाबू और रोयें मुंशीजी । नामुमकिन ! आप में दम खम हो तो आ जाइए मैदान में ।
सतीश : लेकिन खेल तो मैं रहा हॅू मुंशीजी ।
मुंशीजी : आप क्या खाकर पत्ते खेलेंगे । जरा सरकिए और पत्ते मुझे दीजिये भगवान के फजल से ।
सतीश : लीजिये, मगर मेरे पत्ते जोरदार हैं ।
मुंशीजी : पत्ते मुझे दे दीजिए, हारी बाजी जीतना मुंशी इतवारीलाल के बाएं हाथ का खेल है  भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : (कमरे में प्रवेश करते हुये) हां हां, दे दो पत्ते सतीश बाबू, मुंशीजी अभी मेरा बंटाधार करके गये हैं । तुम्हारा भी पाटियागुल कर देंगे ।
मुंशीजी : बाबूलाल जी !
बाबूलाल : मुंशीजी ।
मुंशीजी : आपसे अर्ज करूं कि बचपन में कैसे गिनती पढ़ता था मैं ।
बाबूलाल : जरूर मुंह से ही पढ़ते होंगे ।
मुंशीजी : मुंह से तो पढ़ता था, पर क्या पढ़ता था ।
बाबूलाल : यही भी मैं ही बताऊं ।
मुंशीजी : बताइये नहीं, सिर्फ सुनिये । मैं पढ़ता था – एक, दो, तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ,, नौ, दस, गुलाम, बेगम, बादशाह…..भगवान के फजल से । क्या समझे बाबूलाल जी ।
पंडितजी : यही की आपके बचपन में दूसरी गिनती पढ़ाई जाती थी ।
मुंशीजी : जी नहीं, यह समझिये कि मैं ताश का कितना शातिर खिलाड़ी हॅू । इन पत्तों के सिवा मुझे किसी पेड़ पर कोई पत्ता नजर नहीं आता भगवान के फजल से ।
सतीश : कमाल है मुंशीजी आप शतरंज के उस्ताद हैं, बटेरबाजी, कबूतरबाजी और बुलबुलबाजी में माहिर हैं, ताश में शातिर है और ………
बाबूलाल : पतंगबाजी में दस नंबरी हैं, क्यों मुंशीजी ।
मुंशीजी : आप लोगों को रश्क क्यों होता है । यह तो मेरा बड़प्पन है, जो हर फन में दखल रखते हुये भी आपके मुहल्ले की धूल फांक रहा हॅू भगवान के फजल से ।
पंडितजी : धूल नहीं फांकते । आप तो मुहल्ले की शोभा बढ़ा रहे हैं मुंशीजी ।
बाबूलाल : क्यों नहीं , आखिर मीर बख्शी घराने के मुंशी ठहरे ।
सतीश : भई यह मीर बख्शी क्या है ।
मुंशीजी : घराना है ।
सतीश : कैसा घराना, जैसा संगीत का होता है ।
मुंशीजी : जी नहीं, संगीत के घराने में हर तरह के लोग शामिल होते हैं । पर मीर बख्शी घराने में मेरे नगड़ दादा थे, दादा थे, मेरे पिता थे, मैं हॅू और अब मेरा लड़का है ।
बाबूलाल : और आपके लड़के का लड़का भी मीर बख्शी होगा । क्यों मुंशीजी ।
मुंशीजी : और क्या वह ऐरा गैरा होगा, बाबूलालजी ।
सतीश : आपका नाम इतवारीलाल कैसे पड़ गया मुंशीजी !
मुंशीजी : मैं एक अजीमुश्शान इतवार के दिन धरती पर रौनक अफरोज हुआ, इसीलिए मेरे बाबा मरहूम मुंशी बुधवारीलाल ने मुझे यह नाम अता फरमाया ।
बाबूलाल : वह अजीमुश्शान इतवार कौन सा था मुंशीजी !
सतीश : वह इतवार जब सूरज को ग्रहण लगा था ।
पंडितजी : जी नहीं, जिस इतवार की रात पुच्छलतारा निकला था ।
मुंशीजी : जी नहीं साहबान, यह वही इतवार था, जिस इतवार से शहंशाहे अकबर ने सूरज की पूजा शुरू की थी और दीनइलाही चलाया था भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : कमाल है, मुंशीजी का इतिहास तो मुगलवंश से जा चिपका ।
मुंशीजी : इसमें कमाल की क्या बात है । हमारे सत्रह पुरखे मुगल बादशाहों के मीर बख्शी रह चुके हैं । 
सतीश : और आपके बाबा बुधवारीलाल जी क्या थे ।
मुंशीजी : अरे साहब, वो क्या नहीं थे । मेरी ही तरह बड़े माहिर थे । वे एक रियासत में ओहदा सम्हाले हुए थे ।
बाबूलाल : कौन सा ओहदा ।
मुंशीजी : वह ऊॅंटखाने के मुंशी थे भगवान के फजल से ।

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सभी हंसने लगते हैं ।

मुंशीजी : हॅंसिये नहीं साहबान, जमाने में उनकी ऐसी धाक थी कि रियासत का कोई भी ऊॅंट बौराने पर पच्छिम की तरफ नहीं भाग सकता था भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : वाह वा ।
मुंशीजी :उन्होंने ऊॅंटों के बलबलाने का वक्त मुकर्रर कर दिया था, ताकि उनकी नींद में खलल न पड़े भगवान के फजल से ।
पंडितजी : निद्रा के प्रेमी थे ।
मुंशीजी : जनाब, नींद के लिये नौकरी छोड़ दी थी उन्होंने ।
सतीश : यह कैसे ।
मुंशीजी : हुआ यह कि एक दोपहर रियासत के महाराज ऊॅंटखाने से गुजरे ।
सतीश : फिर ।
मुंशीजी : उन्होंने कड़ककर मुंशीजी से पूछा “तुम कौन हो ।” मुंशीजी नींद से जगे और घबराकर बोले हुजूर, मैं मुंशीखाने का ऊॅंट हॅू ।
सभी लोग हंसने लगे ।
पंडितजी : मुंशीखाने का ऊॅंट हॅू ।
मुंशीजी :जनाब ! महाराज ने इस पर गुस्सा होकर कहा, “तुम मुंशी खाते हो या शेर, मुझे इससे मतलब नहीं । मुझे ऊॅंट की नहीं, मुंशी की जरूरत है ।” और उन्होंने बाबा मरहूम को उसी वक्त बाइज्जत विदा कर दिया ।
पंडितजी : आपका भी जवाब नहीं मुंशीजी ।
मुंशीजी : अरे जवाब तो तब हो जब सवाल हो । यारों हमें तो खुद अपने जवाब के सवाल की तलाश है । (अचानक) माफ कीजियेगा, अब मैं चला भगवान के फजल से ।
बाबूलाल : अरे, जरा रूकिये तो ।
सतीश : अब मुंशीजी नहीं रूक सकते । देखते नहीं, उनके उत्तर का प्रश्न यानी मुंशियाइन जी तशरीफ ला रही हैं । 
सभी हंस पड़ते हैं ।
समाप्त 
लेखक: श्री नरेश मिश्र

मित्रों यह नाटक आकाशवाणी इलाहाबाद से “हवामहल” कार्यक्रम के तहत 1७ साल चले मेगा सीरियल “मुंशी इतवारीलाल” धारावाहिक की एक कड़ी की स्क्रिप्ट है। इसके लेखक हैं श्री नरेश मिश्र । “मुंशी इतवारीलाल” उस दौर का रेडिओ का इतना लोकप्रिय धारावाहिक था की फिल्म कलाकार कादर खान ने अपनी एक फिल्म में “भगवान के फजल से” डायलोग को कॉपी किया था.

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