इस शहर में आल्हा गाने की परंपरा अब दम तोड़ चुकी है । बीती सदी में झमाझम पानी बरसता था तो जवान लोग कड़कदार आवाज में आल्हा गा कर सुनने वालों में जोश भर देते थे । इस साल सूखे असाढ़ में भी आल्हा की परंपरा दिलचस्प तरीके से दोहरायी गयी ।
चमनगंज और दमपुरा के बीच तारापुरा मैदान में बिगड़ैल बांकों के दो दल बाकायदा चुनौती देकर आमने सामने हो गये । दोनों के बीच जबर्दस्त फायरिंग शुरू हो गयी तो आसपास की बस्ती में भगदड़ मच गयी ।
गोलीबारी की खबर पाकर पुलिस बल के साथ दरोगा मौके पर पहुंच गया । पुलिस को देख गुण्डों के हमलावर दस्ते घटनास्थल से भाग खड़े हुये । दरोगा ने दो बदमाशों को चहेट कर पकड़ लिया । उसने एक बदमाश को जोरदार तमाचा जमा कर पूछा, ‘क्यों बे, तेरी यह हिम्मत । दिन दहाड़े गोली चलाने में तुझे डर नहीं लगा ।’
बदमाश ने बेबाक जवाब दिया, ‘सरकार दुश्मनों ने मोबाईल पर मेसेज भेज कर हमें इस मैदान में लड़ने के लिये ललकारा था । हम इस चुनौती पर घर में चूड़ियॉं पहन कर तो नहीं बैठ सकते ।’
=> बरखा रानी…..जरा जम के बरसो……मेरा दिलबर ..जा न पाए…. झूम कर बरसो…………….देखा आपने. मैं भी राग मल्हार गा सकता हूँ….बस एक अदद दिलबर की कमी है.
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