काम ऐसे करो कि लोग आपको….

किसी दूसरे काम के लिए बोले ही नहीं….

रविवार, 19 नवंबर 2017

भारतीय संस्कृति में हास्य व्यंग्य की जड़ें

लेखक – श्री नरेश मिश्र
हास्य व्यंग्य का मूल स्रोत हमारी हजारों बरस पुरानी संस्कृति, सभ्यता और जीवन दर्शन में देखा जा सकता है । भारतीय संस्कृति में मृत्यु, भय और दु:ख का कोई खास वजूद नहीं है । हमारे दार्शनिकों ने जिस ब्रह्म की अवधारणा को समाज के सामने रखा वह सत् चित् के साथ ही आनंद का स्वरूप है । ब्रह्म आनंद के रूप में सभी प्राणियों में निवास करता है । उस आनंद की अनुभूति जीवन का परम लक्ष्य माना जाता है । इसी से ब्रह्मानंद शब्द की रचना हुयी है । वह रस, माधुर्य, लास्य का स्वरूप है । इसीलिये ब्रह्म जब माया के संपर्क से मूर्तरूप लेता है तो उसकी लीलाओं में आनंद को ही प्रमुखता दी गयी है । हमारे कृष्ण रास रचाते हैं, छल करते हैं, लीलायें दीखाते हैं । वे वृंदावन की कुंज गलियों में आनंद की रसधार बहा देते हैं । मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम भी होली में रंग, गुलाल उड़ाते हैं और सावन में झूला झूलते हैं । उनकी मर्यादा मे भी भक्त आनंद का अनुभव करते हैं ।

हमारी संस्कृति में मृत्यु और दु:ख को ज्यादा अहमियत नहीं दी गयी है । मृत्यु एक परिवर्तन का प्रतीक है । हम नहीं मानते कि शरीर के साथ आत्मा मर सकती है । वह तो एक पहनावा बदल कर दूसर पहन लेती है । हमारे देश में प्रचलित ऐसे मत, पंथ भी हैं जिनमें शरीर का समय पूरा होने पर खुशी मनाई जाती है । नाच-गाने के साथ, बड़े उमंग और उत्साह से पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार यह मानकर किया जाता है कि जीवात्मा अब अपने स्वामी ब्रह्म से मिलने जा रही है । मिलन की इस पावन बेला मे दु:ख, दर्द और शोक की जरूरत नहीं है ।

हमारे नटराज भोले भण्डारी सामाधि के साथ ही आनंद के भी प्रतीक हैं । वे नृत्य, गायन, व्याकरण, भाषा और ऐसी तमाम गतिविधियों के केन्द्र हैं जिनसे प्राणी के मन में आनंद का सागर हिलोरें लेने लगता है । हमारे अवतारों की तिथियाँ बड़े उत्साह और पूरी श्रध्दा के साथ मनाई जाती हैं । इन अवतारों की निधन तिथियों को कोई भूल कर भी याद नहीं करना चाहता है । वजह साफ है । हम मानते हैं कि अवतार ने प्रकट होने का उद्देश्य पूरा कर लिया अब उसे मूल तत्व यानि ब्रह्म में लीन हो जाना चाहिये ।

हास्य व्यंग्य की यह धारा वेदों के जमाने से लगातार हमारे देश मे बह रही है । इसी सांस्कृतिक अवधारणा ने हमें वह अमृत पिलाया है जिसके सबब हमारी सभ्यता आज भी सनातन कही जाती है । भारतीय संस्कृति में ईश्वर की अवधारणा इस तरह रची बुनी गयी है कि हम उससे डरते नहीं हैं । वह कोयी ऐसी शक्ति नहीं है जिससे डरना जरूरी हो । वह प्राणियों में भय का संचार नहीं करता । वह हमारा आदि स्रोत है । हम उसी के अंग हैं । वह जड़ चेतन में व्याप्त है । हम उसके के साथ कोई भी रिश्ता बनाने के लिये स्वतंत्रत हैं । इसीलिये संत कबीर ने कहा था –

हम बहनोई, राम मोर सार । हमहिं बाप, हरिपुत्र हमारा ।
कोई उपासक अपने उपास्य से इमने आत्मविश्वास के साथ ऐसा रिश्ता जोड़ने का साहस नहीं कर सकता । यह हमारी संस्कृति की खास देन है । हम अपने उपास्य से अनेक रूपों में प्रेम कर सकते हैं । हम उसके दास, सखा, सेवक यहां तक कि शत्रु और स्वामी भी बन सकते हैं । हमारी इसी वैचारिक स्वतंत्रता ने समाज को हास्य व्यंग्य का उपहार दिया है ।

हम मानते हैं कि ब्रह्म के अलावा सभी जीव गुण और दोष के पुतले हैं । गुण और दोष का मिश्रण ही मनुष्य की खास पहचान है । हम आनंद की अनुभूति के लिये पैदा हुये हैं । रोने-धोने, बिसूरने और निषेधात्मक भयादोहन करने वाली चिंताओं में बैचेन रह कर जिंदगी गुजारना हमारे जीवन का मकसद कतई नहीं है । समाज में विषमताएं हैं, गरीबी है, आर्थिक द्वंद हैं, दुरूह समस्याएं हैं इसके बावजूद हर हाल मे हंसते रहना और चुनौतियों का डट कर मुकबला करना हमारी संस्कृति का मूल संदेश है । इसलिये हम आये दिन त्यौहार मनाते हैं और सारे गमों को भुलाकर आनंद की नदी में डुबकी लगाते हैं । हम बूढ़े नहीं होते । हमारा शरीर बूढ़ा होता है । बुढ़ापे में भी फागुन आता है तो होली के हुड़दंग में जवान महिलाओं को बुढ़ऊ बाबा से देवर का रिश्ता जोड़ने में कोई हिचक नहीं होती । वे मगन हो कर गाने लगते हैं –

फागुन में बाबा देवर लागे ।
यह बंधनों से मुक्त समाज का प्रतीक है । हम अपने आराध्य देवताओं के साथ भी हंसी मजाक करने से बाज नहीं आते हैं । कुछ नमूने देखिये । भगवान जगन्नाथ के मंदिर में उनका दर्शन कर एक भक्त कवि के मन में सवाल उठता है कि भगवान काठ क्यों हो गये । कठुआ जाना लोक बोली का एक मुहावरा है । भक्त अपनी कल्पना की उड़ान से संस्कृत में जो छंद रचता है उसका हिन्दी रूपान्तर कुछ इस तरह किया जा सकता है –

भगवान की एक पत्नी आदतन वाचाल हैं (सरस्वती) दूसरी पत्नी (लक्ष्मी) स्वाभाव से चंचल हैं । वह एक जगह टिक कर रहना नहीं चाहतीं । उनका एक बेटा कामदेव मन को मथने वाला है । वह अपने पिता पर भी हुकूमत कायम करता है (कामदेव) । उनका वाहन गरूड़ है । विश्राम करने के लिये उन्हें समुद्र में जगह मिली है । सोने के लिये शेषनाग की शैय्या है । भगवान विष्णु को अपने घर का यह हाल देख कर काठ मार गया है ।
कवि भक्त है । उसके मन मे अपार श्रध्दा है । वह आराध्य का अपमान नहीं करना चाहता लेकिन उनके साथ हंसी मजाक करने से बाज नहीं आता ।

दूसरा भक्त कवि आशुतोष शंकर का दर्शन कर सोचता है कि इस भोले भण्डारी, जटाधारी, बाघम्बर वस्त्र पहनने वाले के पास खेती-बारी नहीं है । रोजी का कोई साधन नहीं है तो इनका गुजारा कैसे होते है ।

भक्त संस्कृत में छंद कहता है –

उनके पास पांच मुंह हैं । उनके एक बेटे (कार्तिकेय) के छह मुंह हैं । दूसरे बेटे गजानन का पेट तो हाथी का है । यह दिगबंर कैसे गुजारा करता अगर अन्नपूर्णा पत्नी के रूप में उसके घर नहीं आतीं ।

तीसरा भक्त कवि कहता है कि भगवान शंकर बर्फीले केलाश पर्वत पर रहते हैं । भगवान विष्णु का निवास समुद्र में है । इसकी वजह क्या है ? निश्चित ही दोनों भगवान मच्छरों से डरते हैं इसलिये उन्होंने ने अपना ऐसा निवास स्थान चुना है ।

मृच्छकटिक नाटक के रचयिता राजा शूद्रक हैं । वह ब्राह्मणों की खास पहचान यज्ञोपवीत की उपयोगिता के बारे में ऐसा व्यंग्य करते हैं जिसे सुन कर हंसी आती है । वह कहता है कि यज्ञोपवीत कसम खाने के काम आता है । अगर चोरी करना हो तो उसके सहारे दीवार लांघी जा सकती है ।

संस्कृत, पालि, अपभ्रंश साहित्य में हास्य व्यंग्य के हजारों उदाहरण मिल सकते हैं । कहीं ये उक्तियाँ गहरे उतर कर चोट करती हैं । कहीं सिर्फ गुदगुदा कर पाठकों और दार्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती हैं ।

संस्कृत की यह धारा लोकजीवन में इस कदर रच बस गयी है कि आज भी हमारे लोकगीतों में देवताओं के साथ छेड़-छाड़, हंसी मजाक करने में लोक गायकों को कोई संकोच नहीं होता है । हरिमोहन झा ने अपनी हास्य व्यंग्य पर आधारित पुस्तक ”खट्टर काका” में देवी-देवताओं और अवतारों के साथ खूब जम कर ठिठोली की है । अगर भूल से यह पुस्तक किसी नास्तिक के हाथ लग जाये तो वह इस हंसी मजाक को गंभीरता से ले लेगा और उसकी नास्तिकता और प्रगाढ़ हो जायेगी जबकि यह देवी दवताओं के साथ किया गया मात्र हंसी मजाक है ।

हिन्दी और उर्दू साहित्य के विकास के साथ ही हास्य व्यंग्य विधा परवान चढ़ने लगी । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और अकबर इलाहाबादी जैसे कवियों ने इसे कलेवर दिया । बाबू बालमुकुंद गुप्त अपने अन्योक्तिपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये व्यंग्य साहित्य में एक नया मानक बनाने मे सफल हुये । उर्दू शायरों ने तो ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजियत पर ऐसे तीखे प्रहार किये कि अंग्रेज उसे समझ भी नहीं पाते थे और हिन्दुस्तानी उसका जायका लेते थे ।

अकबर साहब फरमाते हैं –

बाल में देखा मिसों के साथ उनको कूदते ।
डार्विन साहब की थ्योरी का खुलासा हो गया ।
जनाब अकबर इलाहाबादी ब्रिटिश अदालत में मुंसिफ थे लेकिन वे अपने व्यंग के तीरों से ऐसा गहरा घाव करते थे कि पढ़नेवाला एक बार उसे पढ़कर हजारों बार उस पर सोचने को मजबूर हो जाता था । लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दति का पोस्टमार्टम जिस बेबाकी से अकबर साहब ने किया उसकी गहराई तक आज के व्यंगकार सोच भी नहीं सकते हैं –

तोप खिसकी प्रोफेसर पहुंचे । बसूला हटा तो रंदा है ।
प्लासी की लड़ाई में सिराज्जुदौला को शिकस्त देकर तमाम देसी रियासतों को जंग में मात देकर अंग्रेजों ने तोप पीछे हटा ली और अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्रोफेसरों को आगे कर दिया । तोप के बसूले ने समाज को छील दिया और प्रोफेसर के रंदे ने उसे अंग्रेजों के मनमाफिक कर दिया । तोप और प्रोफसर का यह तालमेल ब्रिटिश शिक्षापध्दति पर बेजोड़ और बेरहम हमला है ।

पं0 मदनमोहन मालवीय और सर सैयद अहमद खाँ जिन दिनों हिन्दू यूनिवर्सिटी और मुस्लिम यनिवर्सिटी की स्थापना के लिये प्रयास कर रहे थे उन्हीं दिनों अकबर साहब ने एक शेर कहा था –
शैख ने गो लाख दाढ़ी बढ़ाई सन की सी । मगर वह बात कहाँ मालवी मदन की सी ।
यहाँ ”सन की” शब्द पर गौर कीजिये । दोनों शब्दों को मिला देने पर जो अर्थ निकलता है वह शायर के हुनर की मिसाल है । अकबर साहब पं0 मदनमोहन मालवीय कि मित्र थे । उन्हें सर सैयद अहमद खाँ की अंग्रेज परस्ती फूटी ऑंखों नहीं भाती थी । वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में कोताही नहीं करते थे ।

इक्कीसवीं सदी में हास्य व्यंग्य की विधा का नया कलेवर नई दिशा की ओर संकेत कर रहा है । वह समाज की विसंगतियों का आईना है । जनभावनाओं की हसरत नापने के लिये थर्मामीटर का काम करता है । हमारे तथाकथित लोकतंत्र में जितने पाखंड विद्रूप हैं, जितनी विसंगतियाँ हैं, सियासत में छल-प्रपंच का पासा खेला जा रहा है उसका चित्रण करने के लिये गंभीर गाढ़े शब्दों में रचे गये साहित्य की जरूरत नहीं है । बेरोजगारी, जनसंख्या विस्फोट, जाति विद्वेष, धार्मिक उन्मांद के दम घोंटू वातावरण में हास्य व्यंग समाज को ऑक्सीजन देने का काम करता है । इस बहाने समाज का तनाव कम होता है और उसे राहत मिलती है ।

ज़रा आंख में भर लो पानी (विजय दिवस पर विशेष) कारगिल युध्द . भाग -2


71 के बाद 99 (28 साल का अंतर) एक पूरी पीढ़ी के उग आने का समय । एक पूरी पीढ़ी पैदा होकर जवान हो गई, पाकिस्तान में भी, हिंदुस्तान में भी । युध्द पढ़ा था किताबों में, सुना था बुजुर्गों से, और देखा था टी.वी. पर युध्द आधारित कार्यक्रमों में । कारगिल: हमारी ताज़ी दोस्ती का प्रतीक (लाहौर यात्रा), 28 साल के लम्बे अन्तराल के बाद तूफान का प्रतीक, 50 साल से सुलगती राख में एक चिंगारी का प्रतीक । यह चिंगारी अचानक हवा पाकर शोला हुई, भभकी और हमारे 400 जवानों के खून से अपनी प्यास बुझा कर ठंडी हो गई । कारगिल नई पीढ़ी के लिये एक नया अनुभव था ।

इन दो महीनों में देश में राष्ट्रप्रेम का भीषण ज्वार आया । वीर सैनिकों को रक्तदान के लिये इतनी भीड़ जुटी की इतना खून कैसे, कहाँ सुरक्षित रखें एक प्रश्न था । ज़ज्बा सिर्फ एक कि हमारा लहू उस लहू से मिल जाये जो हिमालय पर काम आया । अरबों रूपये शहीदों के परिवारों के लिये दान दे दिये गये । सहारा परिवार ने 300 सैनिकों के परिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली । सारा देश आज सैनिकों के साथ है ।

सरहद के उस पार से गलतफहमियों और सरकारी अफवाहों ने कारगिल पचड़ा शुरू किया । पाकिस्तान और उसकी सेना को यह गलतफहमी है कि किराये के बम और मिसाइलों से वह भारत को फतह कर लेगा । 28 साल में वहां के बूढ़ों की याद्दाश्त कमज़ोर पड़ गई और उनके बच्चों ने गलतफहमियां पाल ली कि अब तो इंडिया गया समझो । नादान पड़ोसी । हिंदुस्तान कोई अफ्गानिस्तान नहीं है । एक अरब में से 1 प्रतिशत भारतीय भी खड़ा हो गया तो पाकिस्तान नक्शे में ढ़ूढ़ते रह जाओगे । ”अरे यहीं कहीं तो था इंडिया और इरान के बीच में । कहाँ गया ?”

उनको पड़ी है कि एक युध्द में कश्मीर झपट लेंगे । हम राह देख रहे हैं कि बंग्लादेश हो गया, अब पाकिस्तान भी निपटा दें । कारगिल को युध्द नहीं कहा जा सकता है । लगभग 100 किमी. के अखाड़े में डंड बैठक हो गई । पाकिस्तान को अक्ल आ गई कि अपनी औकात पंजा लड़ाने की भी नहीं है अगर कुश्ती हुयी तो एक भी हड्डी साबूत नहीं बचेगी । अमेरिका से चंदा मांगकर जैसे तैसे रोटी चलती है । इंडिया ने ठोंक दिया तो अस्पताल का बिल भी वल्ड बैंक खाते में जोड़ लेगा । ( या फिर कफ़न का खर्चा ) ।

नवाज शरीफ चीन गये । चीन ने कहा ‘अच्छे बच्चे लड़ाई नहीं करते । चलो इंडिया को सॉरी बोलो और कारगिल खाली करो ।’ नवाज नहीं माने । अमेरिका गये । क्लिंटन ने समझाया ‘शांति से रहना सीखो, नहीं तो पॉकिटमनी भी बंद कर दूँगा ।’ बिचारे शरीफ सोचे इंग्लैंड से भी बात कर ली जाये । उसने भी कह दिया ‘ 50 साल के बच्चे अब तो बड़े बन जाओ । ये लड़ना झगड़ना कब छोड़ोगे ? बच्चों कि लड़ाई में बड़े नहीं पड़ते । चलो कारगिल वापस करो ।’ शरीफ शराफत से पाकिस्तान लौट आये । डर भी लग रहा था कि कहीं सरहद पर हिंदुस्तान की तरफ मुँह की हुई तोपें अगर इस्लामाबाद की ओर मुड़ गईं तो उनकी खटिया खड़ी और तख्ता पलट जायेगा ।

शरीफ ने घुसपैठियों से अपील की ”मुज़ाहिद भाइयों, अब वापस आ जाओ । इंडिया डर गया है । इस्लाम कहता है कि डरे हुये को सताना गलत है । वापस आ जाओ (अगर जिंदा हो तो, लाशें हमारे किसी काम की नहीं) क्योंकि हमारा मकसद पूरा हो गया है (लात खाये बहुत साल हो गये थे, बल भर खा लिया है ) वापस आ जाओ क्योंकि अब तुमको देने के लिये राशन और गोलियां खत्म हो गई हैं और हमारी जेब भी खाली हो गई है । हमको मालूम है कि तुम बहुत बहादुरी से लड़ रहे हो पर किसी गरीब मजलूम पर जुल्म नहीं ढ़ाना चाहिये । इंडिया को सबक मिल गया है । कश्मीर मुद्दे का अन्तर्राष्ट्रीय करण हो गया है (कोई भी देश पाकिस्तान के साथ नहीं है । कश्मीर इंडिया के ही पास रहेगा ) वापस चले आओ नहीं तो इंडियन आर्मी पाकिस्तान में घुस आयेगी और हम लोगों को इरान, अफ्गानिस्तान में शरणार्थी बन कर रहना पड़ेगा

कारगिल से घुसपैठियों ने जवाब दिया । ”कमीने शरीफ, तुमने हमको धोखा दिया । हमारे पास खाने को कुछ नहीं है । गोली और गोले खा कर हमारे काफी साथी मारे गये । तुमने कहा था भारतीय कमजोर होते हैं पर वो तो हमारे बाप निकले । एक बार यहाँ से निकल भागें तो तुमको भी देख लेंगें ।” तभी वहाँ एक गोला गिरा ”बड़ाम” । ”अब क्या देखेंगे, खेल ही खत्म हो गया । आह…… मरा….रे.. ।”

युध्द खत्म हो चुका है और अब उनकी बारी है जो युध्द कभी नहीं लड़ सकते पर काठ की तलवारें लहराने में माहिर हैं । ये हैं हमारे आदरणीय नेतागण और बुध्दजीवी का लेबल चिपकाये हुये तमाम बुध्दिजीवी । कारगिल को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा पर हम देखेंगे कि कारगिल का बारूद तेरहवीं लोकसभा में काम आयेगा । पिछली 18 जुलाई रविवार को रात्रि मे एक कार्यक्रम मुंबई के फिल्मी कलाकारों ने शहीद जवानों को समर्पित किया ‘ऐ वतन तेरे लिये’ । शहीदों की आत्माओं की शांति के लिये तथा उनके दु:खी परिवारों को ढ़ाँढ़स बंधाने के लिये ‘प्यार तो होना ही था’, ‘लवेरिया हुआ’, ‘पहला नशा पहला खुमार’ आदि गाने सुनाये जा रहे थे । बीच बीच में बालीवुड के कलाकार आकर श्रध्दांजलियां दे रहे थे ।

राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित जावेद अख्तर और उनकी पत्नी शबाना आज़मी ने अपने विशाल ज्ञान का परिचय दिया और जोश में भारत की आबादी को ‘साढ़े नौ सौ करोड़’ बताया । कारगिल के शहीद आपका आरकेस्ट्रा सुनने के लिये शहीद नहीं हुये हैं । माना शहादत पर आंसू नहीं बहाये जाते पर मुजरा भी नहीं किया जाता है ।

(ये व्यंग्य अगस्त 1999 में इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था ।)

खाना खजाना – 2

 =>चना जोर गरम बाबू मैं लाया  मज़ेदार, चना जोर गरम ।

कुरकुरे, चटपटे, मसालेदार लईया-चने ।

रेसिपी उर्फ बनाने का तरीका:-

जी, पहले तो आपके घर में एक लोहे की कड़ाही होनी चाहिए जिसमें कि आप चना और लाई भुनेंगे । चाहें तो स्वाद बढ़ाने के लिए 50-100 ग्राम मूंगफली भी भून सकते हैं । अब जब इतना टिटिम्मा कर ही रहे हैं तो दो-चार चीजें और भी भून सकते हैं । खैर । तो पहले तो एक लोहे की कड़ाही का इंतजाम कर लीजिए । उसके बाद एक किलो बालू जिसमें कि पाव भर पिसा नमक पड़ा हो उस कड़ाही में डाल कर गर्म कर लें । अब बारी बारी से लाई-चना उसमें डाल कर भून लीजिए । पहले लाई भुनेंगे तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि इस को आंच कम चाहिए होती है । उसके बाद चने और मूंगफली को कड़ाही में डाल कर भून डालिये । ठीक । अब एक दूसरे बड़े बर्तन में चने और मूंगफली को डाल कर किसी भारी चीज से दर लीजिए, जिससे कि उनके छिलके निकल जायें । ठीक है । छिलके निकालना इस लिए जरूरी होता है क्योंकि इससे पेट में अपान वायु बनने लगती है और अगल बगल वालों से ये बात छिपी नहीं रहती कि आज शाम आपने किस चीज का नाश्ता किया था । इसके अलावा चने के छिलकों से कुष्ठ रोगी के कुष्ठ में आशातीत वृद्धि हो सकती है । तो चने के छिलके दर कर निकाल लें । छिलके निकालने के लिए आपको एक सूप की भी जरूरत पड़ेगी और सूप पछोरना भी आना चाहिए । फिर इन सब कामों में तो घर की महिलाएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती हैं । अच्छा अब आपके भुने हुए लाई, चने और मूंगफली का नाश्ता तैयार है । इसमें 8-10 बूंद कड़ुवा तेल और एक प्याज बारीक कतर कर मिला लीजिए । इसको अब आप एक प्लेट में नमक, हरी मिर्च और हरे धनिये की चटनी के साथ सर्व कीजिए । खाने वाले वो चटकारे ले-ले कर खायेंगे कि आप भी क्या याद करेंगे ।

यदि घर में लोहे की कड़ाही और बालू वगैरह नहीं है और आप ये सब कसरत भी नहीं करना चाहते हैं तो फौरन बाज़ार की तरफ कूच कर जाईये और किसी भड़भूंजे से पाव भर भुने हुए लइया,चने, मूंगफली 10-15 रू0 में खरीद कर जल्द से जल्द घर वापस आ जाईये, ताकि गर्मागर्म लइया चना ठंडा न हो जाये और आपकी तमाम कोशिशों पर पानी न फिर जाये । काहे कि गर्मागर्म लइया, चने की बात ही कुछ और होती है । अब आराम से ड्रांइग रूम में सोफे पर पसर कर, टी.वी. पर मैच देखते हुए या कोई बकवास फिल्म देखते हुए या न्यूज़ चैनल पर कोई फर्जी न्यूज देखते हुए गर्मा गर्म कुरकुरे मसालेदार लइया, चने नोश फरमायें ।

और हां ! बूढे-बुजुर्गों को हिदायत दीजियेगा कि थोड़ा आराम से खायें क्योंकि कुछ कुछ चने साले वाकई में दुष्ट प्रकृति के होते हैं और अकेले ही भाड़ फोड़ने की फिराक में लगे रहते हैं । ऐसे में बुजुर्गों का अति उत्साह उनके हिल रहे दांतों पर भारी पड़ सकता है, जिसका अंजाम बाद में डेन्टिस्ट को तगड़ी फीस देकर और उस मरियल दांत से हाथ धोकर (मुंह धोकर) भुगतना पड़ सकता है ।

तो ये था आजका ज्ञानवर्धक खाना खजाना । मिलते हैं अगले भाग में, लेकर एक और नई लज़्जतदार, शानदार रेसिपी के साथ । तब तक के लिए नमस्कार ।

खूबसूरत कामवालियां

वैधानिक चेतावनी : ये चित्र सिर्फ बालिगों के लिये हैं । नाबालिग लोग बालिग लोगों से व्यंग्य चित्र के मौखिक विश्लेषण सुन सकते हैं ।

मंदी की वजह से हसीन फिल्मी नायिकाओं को काम की दिक्कत आ पड़ी है और अब वे घर के छोटे मोटे काम के लिये नौकरियां तलाश रही हैं । प्रस्तुत है चित्र सहित उनकी विशेषता ।

<=>इन मोहतरमा का नाम है याना गुप्ता । बहुत पहले ये भैंस पर सवार हो कर बिजलियां गिराया करती थीं । आज कल खाली हैं । खाना अच्छा बना लेती हैं । चाहे मुगलई हो, चाइनीज़ हो, देसी हो, या फिर कॉन्टीनेन्टल । कुछ भी बनवा लीजिये । हां खुद बहुत कम खाती हैं ।

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=>इस हसीना का नाम है प्रीती जिंटा । फिल्में अब कम ही मिलती हैं । कुछ समय पहले आई.पी.एल की पंजाब टीम को खरीदा था । टीम के साथ इनका भी बंटाधार हो गया । आजकल खाली हैं । काम की तलाश है । फास्ट फूड परोसने में इनकी सानी नहीं है । जब आप थक हार कर घर पहुंचोगे तो ठंडा पिलाकर आपको ठंडा कर देंगी ।

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=>ये नाज़नीं भी आजकल खाली बैठी हैं । नामीगिरामी परिवार से हैं । नाम है करीना । खाली समय में कुछ समय तो छोटे नवाब सैफ अली के साथ चोंच लड़ाती है बाकी समय के लिए काम ढूंढ रही हैं । वैसे सैफ के यहां झाड़ू पोछा करते करते अब इनको इस काम में महारत हासिल हो गयी है, इसलिये ये झाड़ू पोछा की पार्ट टाइम नौकरी करना चाहती हैं । सिर्फ दिन में एक टाइम सुबह ही आया करेंगी क्योंकि दोपहर तक सैफ नींद से जाग जाते हैं और शाम का समय चोंच लड़ाने के लिये फिक्स किया हुआ है ।

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=>इस फिल्म तारिका का नाम आयशा टाकिया है । आजकल किसी भी टाकीज़ में इनकी कोई भी फिल्म नहीं चल रही है। मसरूफ होने के लिये इन्होंने हाल ही में शादी कर ली । सुबह सवेरे हस्बैण्ड को डरा धमका कर काम पर भेज देती हैं । खाली समय घर पर बोर होती रहती हैं । डराने धमकाने में इनको महारत हासिल है । अगर आप के बच्चे आपसे डरते नहीं हैं तो आप इनको काम पर रख लीजिये । ये बच्चे क्या उनके बाप तक को डरा सकती हैं । यकीन न हो तो फोटो पर गौर करिये ।

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=>ये हैं प्रख्यात नायिका तनुश्री दत्ता । जब से इन्होंने नाना पाटेकर से पंगा लिया है तब से इनको फिल्में मिलना कम हो गयी हैं क्योंकि म.न.से. प्रमुख राज ठाकरे ने इसे महाराष्ट्र की शान के खिलाफ समझा और सभी फिल्म निर्माताओं को धमकी भरा एस.एम.एस. भेज कर समझा दिया कि तनुश्री को अब एक्टे्रस क्या एक्सट्रा के रोल के लिये भी लिया तो उनसे बुरा हालांकि पूरे भारत में अभी तक कोई नहीं है बाद में इंडिया में भी कोई नहीं होगा । सो अब तनुश्रीदत्ता को भी काम की तलाश है । जब से नाना पाटेकर से पंगा लिया है और म.न.से. ने इनको बैन किया है तब से राज ठाकरे से दो दो हाथ करने के लिये कुश्ती के दांव पेच सीख रही हैं । राज ठाकरे तो अब इनके हाथ आने से रहे, फिल्में भी अब मिलती नहीं दिख रही हैं, इसलिये अब इन्होंने पार्टटाइम काम शुरू किया है लोगों को सेल्फडिफेंस की शिक्षा देने का । कुछ दांव पेंच अगर आप भी सीखना चाहते हों तो तनुश्री से मेल मिलाप कर सकते हैं ।

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=>ये हैं पूर्व मिस वल्ड प्रियंका चोपड़ा । इधर इनकी भी काफी फिल्में लोटपोट हो गयी हैं । नये काम की तलाश इनको भी है । इनकी खासियत ये है कि मैल से इनको एलर्जी है । थोड़ी सी भी गंदगी ये कपड़ों पर बर्दाश्त नहीं कर पाती । कोई भी जगह हो, तुरंत अपने कपड़े उतारती है और धो डालती हैं । अगर आप पटाखा धोबिन रखना चाहते हों तो इनका फोन ट्राई कर सकते हैं ।

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=>ये हैं मरहूम फिरोज खान की खोज सेलिना जेटली । इनको अब फिल्मों में हिरोइन छोड़िये नाच गाने का भी रोल कोई नहीं दे रहा है । गाना बजाना तो फिरोज खान ने इनको तबीयत से सिखाया था । वहीं एक हुनर आता है इनको । अगर आप संगीत की और खास तौर पर वायलेन की शिक्षा लेना चाहते हैं तो आप इनको गुरू बना सकते हैं । गुरू दक्षिणा ये ज्यादा कुछ नहीं लेंगी । हां कोर्स ज़रूर लंबा खिंच सकता है ।
इसके अलावा ये खाली वक्त में बच्चों के लिये क्रेच भी चलाती हैं, जहां रोते बच्चों को चुप कराने के लिये कभी कभी ये घोड़ा भी बनती हैं । ये सुविधा देखकर कुछ बच्चों के नालायक बापों ने भी रोना शुरू कर दिया लेकिन सेलिना ने उनके लिये घोड़ा बनना मंजूर नहीं किया । =>

ये थी कुछ हसीनाएं जिनको काम की तलाश है । ये घरेलु कामकाज में पूरी तरह से दक्ष हैं । घर फोड़ने में भी इनको पूरी कुशलता हासिल है । अपनी जरूरत और जेब देखते हुये आप इनको हायर कर सकते हैं और हां पत्नी की सलाह जरूर ले लीजियेगा क्योंकि काम तो उनको ही कराना है लेकिन आपका भी मन लगा रहेगा

गरीबी का मारा अमीर रिक्शेवाला

=> बीस रूपये से एक पैसा कम नहीं लूंगा । दस रूपये में आप रिक्शा चलाइये, मैं रिक्शे पर बैठता हॅंू ।

जनता एक्सप्रेस ने अपने वादा निभाया था । भोलाराम और तमाम दूसरे यात्रियों को उसने इलाहाबाद पहुँचा कर ही दम लिया । ये और बात है कि ट्रेन अपने निर्धारित समय से मात्र चार घंटे ही लेट थी । एहसान ही था भारतीय रेल का सभी यात्रियों पर क्योंकि कल यही ट्रेन पौने आठ घंटे लेट आई थी । समय का क्या है, इफरात में पड़ा रहता है । कम से कम भारत में तो समय की कोई कीमत नहीं होती है । घर तो पहँच ना ही है । चाहे आज पहुँचे, चाहे कल । तत्काल की सुविधा सिर्फ टिकट खरीदने तक ही सीमित है । एक्सप्रेस सरचार्ज किस-किस ट्रेन पर लगाया गया है इसकी जानकारी सिर्फ रेल विभाग के सुपर कम्प्यूटर को ही दी गई है । इंजन चालक से लेकर तमाम दूसरे कर्मचारीगण इस प्रकार की किसी भी जानकारी से अनभिज्ञ हैं । हाँ, यात्रियों की जेब में मुद्रा संकुचन की स्थिति जरूर पैदा हो जाती है । अब देखिये अर्थ और मुद्रा से सम्बन्धित दिक्कतों के लिए हमें वित्त मंत्रालय के सामने जाकर ऑंसू बहाने चाहिए । ये क्या कम है कि किसी रेल दुर्घटना में अगर आपके दोनों हाथ या पांव कट जायें तो रेल मंत्री आपको पचास हजार का चेक सप्रेम पकड़ा देते हैं । अब अगर वो चेक बाउंस कर जाता है तब इसमें रेल विभाग की क्या गलती । अब आप रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के सामने जाकर अपने कटे हुए हाथ-पांव फैलाकर भीख मांगने का गौरव अर्जित कर सकते हैं । भीख मांगना राष्ट्रीय कर्म है । विश्व बैंक और आई. एम. एफ. के सामने जैसे हमारी सरकार कटोरा लिया खड़ी रहती है । कटोरा हमारा राष्ट्रीय बर्तन है ।

देर तो हो ही चुकी थी, घर पहँचने की कोई जल्दी भी नहीं थी इसलिए भोलाराम ने टैम्पों की जगह रिक्शे को तरजीह दी । कंजूस भोलारामजी हर जगह मोलभाव करने से बाज नहीं आते । बड़ी चिक-चिक के बाद आखिर एक हट्टा-कट्टा जवान रिक्शेवाला बीस रूपये पर राजी हुआ । गरीब आदमी से उसके घर का, खेत-खलिहान का हाल चाल पूछिये तो वो जल्दी ही पिघल जाता है । घर जाकर कर थोड़ा सा गुड़ और एक लोटा पानी पिला दीजिए तो कभी-कभी पांच रूपये की बचत भी हो जाती है । समय काटने के लिए और उसकी गरीबी पर हमदर्दी जताने के लिए भोलाराम ने उससे बात करनी शुरू की ।

क्यॅंू  भाई क्या नाम है तुम्हारा?

”सीताराम नाम है बाबूजी ।” उसने थोड़ी देर बाद जवाब दिया ।

”तो सीतारामजी कहाँ के रहने वाले हो ?”

”साहब रीवाँ जिले के सौहागी पहाड़ पर छोटा सा गाँव है हमारा ।”

”यार बोल-चाल से तो तुम कुछ पढे लिखे मालूम देते हो !”

”हाँ बाबूजी, दर्शनशास्त्र से एम. ए किया है मैंने रीवा युनिवर्सिटी से ।”

जान कर भोलाराम को आश्चर्य हुआ और थोड़ा दुख भी हुआ कि एम.ए. पास युवक रिक्शा चला रहा है । भोलाराम ने सीताराम का इंटरव्यू जारी रखा ।

”यार तब तुम कहीं कोई नौकरी क्यूं नहीं कर लेते हो, बेवजह रिक्शा चला रहे हो ।” भोलाराम ने उसको फ्री फंड का काम चलाऊ सुझाव दिया ।

”साहब जी इसी नौकरी के चक्कर में ही तो रिक्शा खींच रहे हैं ।” उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया ।

एका एक भोलाराम की हैरानी बढ गई । ”वो कैसे, क्या किसी मंत्री संत्री को घूस देने के लिए पैसा का जुगाड़ कर रहे हो ?”

”नहीं बाबूजी बात आपने उल्टी कही है । रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लर्क की नौकरी के लिए दादा-परदादा की जमीन बेच कर तीन लाख रूपये एक छुटभैया नेता जी को थमाये थे । क्लर्की तो मिली नहीं खेत भी हाथ से निकल गया ।” सीताराम की बातों में दर्द छलछला आया था । भोलाराम को भी उसकी कहानी सुन कर दु:ख हुआ ।

बात बदलने के लिए भोलाराम ने आगामी अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनाव का जिक्र छेड़ दिया । ”तो भाई सीताराम इस बार वोट किस पार्टी को देने जा रहे हो ।”

”क्या बाबूजी अपने भी किन हरामियों की याद दिला दी । सब साले एक जैसे हैं । किसी एक को भी वोट देना अपने वोट के साथ बलात्कार करने जैसा है ।” सीताराम का मुँह कडुवा हो गया था, उसने सड़क पर खखार कर बलगम थूक दिया ।

”क्यूँ भई, आज देश इतना तरक्की कर चुका है, चाँद पर जा रहा है, न्यूक्लियर रियेक्टर लगा रहा है, गरीबी पहले से कितनी कम हुई है, गाँव-गाँव कितना विकास हुआ है । देश ने साठ साल में इत्ती तरक्की की है और तुम हो कि नेताओं को कोई श्रेय ही देना नहीं चाहते हो ।” भोलाराम ने दलील दी ।

”क्या साहब आप भी पढे लिखे हो कर सरकार के चरके में आ गये । सरकारी आंकड़े नेताओं की ही तरह फर्जी होते हैं । थोड़ी सी अक्ल लगायेंगे तो वास्तविकता सामने आजायेगी ।”

भोलाराम इस पढे-लिखे रिक्श वाले की बौध्दिक बाते सुन कर हैरान हो रहा था । ”तुम सरकारी आंकड़ों को फर्जी कैसे कह सकते हो ?” भोलाराम ने प्रतिवाद किया ।

”क्या साहब, आप जैसे पढे लिखे लोगों को पढाना सरकार के बांये हाथ का खेल होता है । क्या आपने कभी संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव विकास सूचकांक को देखा है । हर साल प्रकाशित होता है । उस सूचकांक में भारत देश का नम्बर 128 वाँ है । मतलब इस दुनिया में 127 देशों में गरीबी हमारे देश से कम है ।

भोलाराम आश्चर्यचकित हो गये । लेकिन सीताराम ने आंकड़े देना जारी रखा ।

”सर जी सरकार कहती है कि भारत में 25 फीसदी लोग ही गरीब हैं लेकिन यू. एन. ओ. के अनुसार भारत में 84 करोड़ लोग ऐसे हैं जो कि हर रोज 20 रूपये भी नहीं कमा पाते हैं । यही आंकड़ा हमारे अर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह जी के वर्तमान आर्थिक सलाहकर प्रो अर्जुन सेन गुप्ता की 2006 की रिपोर्ट में भी प्रकाशित हुआ है । सरकार भी इसे सच मानती है ।”

”फिर 25 फीसदी का आंकड़ा कहां से आया है ? भोलाराम ने जिज्ञासा प्रकट की ।

”सरजी सन 1971-72 से सरकार ने कैलोरी आधारित गरीबी का नया पैमाना शुरू किया है जनता को धोखे में रखने के लिए । सरकार का कहना है कि गाँव में हर रोज अगर आपको 2400 कैलोरी और शहर में हर रोज अगर आपको 2900 कैलोरी का भोजन मिल रहा है तब आप गरीबी की रेखा से ऊपर हैं । यानि की गाँव में रहना वाला व्यक्ति अगर प्रतिदिन 12 रूपये कमा रहा है और शहर में रहने वाला व्यक्ति अगर प्रतिदिन 18 रूपये कमा रहा है तब वह गरीब नहीं है । गरीबी का यह सरकरी पैमाना कैलोरी पर आधारित है, प्रति व्यक्ति आय पर नहीं ।”

”लेकिन नेता तो कहते हैं कि गरीबी का कारण जनसंख्या वृध्दि है ।” भोलाराम ने सीताराम से और आंकड़े निकलवाने चाहे ।

क्या सॉब आप पढे लिखे लोगों को सरकारें भी खूब उल्लू बनाती हैं । आपको नहीं मालूम है तो चलिए मैं ही आप का ज्ञानवर्धन किये देता हँ । जब देश 15 अगस्त सन 1947 में आजाद हुआ था तब हमारी आबादी थी 32 करोड़, जिसमें गरीब थे मात्र 2 करोड़ लोग । ये भारत सरकार का आंकड़ा हैं जिसे सरदार पटेल के करीबी हिम्मत भाई पटेल ने बड़ी मेहनत से तैयार किया था । आज सन 2009 में भारत की आबादी है 120 करोड़ और गरीब हैं 84 करोड़, ये मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार प्रो0 अर्जुन सेन गुप्ता की 2006 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट कहती है । यानि की सन 47 से आबादी बढी है चार गुना लेकिन गरीबी बढी है 20 गुना । कुछ समझे आप । यानि की गरीबी का जनसंख्या वृध्दि से कोई लेना देना नहीं है । इसी तरह से सन 47 में पूर्णरूप से बेरोजगारों की संख्या थी 2 करोड़ आज है 20 करोड़ यानि की 10 गुना बेरोजगारी भी बढ गई है ।”

”फिर इतनी विशाल गरीबी के क्या कारण हैं ?” भोलाराम ने जानना चाहा ।

”इस गरीबी का सीधा कारण है नेता और भ्रष्टाचार । हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी कहते थे कि अगर किसी योजना के तहत एक रूपये दिल्ली से भेजा जाता है तो आम आदमी को सिर्फ दस पैसे ही मिलते हैं । इस गरीबी को मिटाने के लिए कई पंचवर्षीय योजनाएं चलाई गईं, इससे नेताओं की गरीबी तो मिट गई लेकिन जनता और गरीब होती चली गई । इस गरीबी का सबसे बड़ा श्रेय तो उसी हाथ को जाता है जिसने 50 साल देश पर शासन किया और अब कहती है कि उसने देश की गरीबी तकरीबन मिटा दी है । साहब अगर स्विस बैंक में जमा भारतीय पैसों का हिसाब लगाया जाये तो 80 प्रतिशत पैसा इसी पंजे का जमा किया हुआ निकलेगा । देश का बंटवारा इनके कार्यकाल में हुआ, दो तिहाई जम्मू कश्मीर इन्होंने ने ही गंवाया, अरूणाचल प्रदेश की 90 हजार वर्ग किलो मीटर जमीन चीन ने इनकी कायरता के कारण छीन ली, पिछले पांच सालों में देश में जितनी आंतकवादी घटनाएं घटी उतनी तो इराक और अफ्गानिस्तान में भी नहीं घटीं । फर्जी आंकड़ेबाजी तो इतनी है कि 6 महीने में मंहगाई दर 12.5 प्रतिशत से 0.25 प्रतिशत पर पहँच गई जबकि मंहगाई उतनी ही है । क्या चीज सस्ती हुई है इसकी कोई खबर नहीं है । इन्होंने देश को मात्र पांच साल के अंदर कृषी निर्यातक से कृषी आयतक देश बन दिया । कितना कुछ इन्होंने देश को बर्बाद करने में किया लेकिन फिर भी बेर्शमों की तरह फिर सरकार बनाने का ख्वाब देख रहे हैं । क्या करिएगा, इस खूनी पंजे का धंधा ही यही है ।”

इतना लंबा भाषण सुनने के बाद भोलाराम से रहा नहीं गया मित्रों और एका एक उनका मुँह खुला और आग सी निकली :

”अबे साले! पहले ये बता कि तू भाजपाई है या सपाई है या कामरेडी है । बड़ा आया है भाषण देने वाला । यहीं पर रिक्शा रोक । मैं यहाँ से पैदल चला जाऊंगा । एक पैसा नहीं मिलेगा तुमको । साले! रिक्शावाला बनकर गांघी जी की पार्टी के खिलाफ कनवेसिंग करता है । चल भाग यहाँ से । देश की तरक्की से जलने वाले संघी हो तुम लोग ।”

भोलाराम की ये बातें सुन कर रिक्शावाला खड़े खड़े मुस्कुराने लगा । बोला ”साहब आप का मुहल्ला आ गया है, घर भी आपका अगल-बगल ही होगा । पैसा नहीं देना है तो मत दीजिए, आपके 20 रूपयों से मेरी गरीबी में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है, लेकिन अगर आप लोग ऐसी ही सरकारें चुनते रहे तब वो दिन दूर नहीं जब आप भी गरीबी की रेखा के नीचे पहँच जायेंगे ।” इतना कह कर सीताराम वापस अपना रिक्शा लेकर चला गया ।

भोलाराम जी ने अपना ब्रीफकेस उठाया और खुशी खुशी अपने घर की ओर चल दिये, खुश होते भी क्यों न आखिर उनके 20 रूपये जो बच गये थे ।

घरेलू पुष्पक विमान

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मित्रों, अभी एक धांसू खबर पढ़ी है । पढ़ते ही कान में हवाई जहाज की आवाज गूँजने लगी । खबर इतनी ज्यादा किफायती है कि आप भी बैंक की पासबुक खोजने लगोगे । अभी सुबह का अखबार बांच रहा था । एक खबर थी कि अब कार की कीमत में मिलेंगे विमान । खबर पढ़ते ही मुझे अपनी टुटही साइकिल का ध्यान आया जो कि मेरे स्व. दादा जी की है । उस ऐतिहासिक साइकिल पर चढ़ कर मैं रोज सुबह पप्पू को स्कूल छोड़ने जाता हँ और वापस लौटते वक्त पराग का पैकेट पॉलिथीन मैं लटका कर घर वापस आता हँ । मेरी यह हार्दिक इच्छा है, सच्ची यह हवाई जहाज वाली खबर पढ़ने के बाद तो हार्दिक महत्वकांक्षा है कि राष्ट्रीय संग्रहालय मेरी खानदानी साइकिल को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दे और बदले में मुझको 5-10 लाख रूपये मुआवजा दे दे क्योंकि वह साइकिल पप्पू को स्कूल छोड़ने के अलावा मुझे दफ्तर ले जाती है, शाम को सब्जी ढ़ोती है, उसके जर्जर हो चुके कैरियर पर बिठा कर मैं अपनी फैमिली को पिक्चर दिखाने भी ले जाता हँ । सो एक तरह से वह हमारी मर्सडीज है । अब मर्सडीज तो 25 लाख के ऊपर आती है पर मैं सरकार से सिर्फ 10 लाख की ही इच्छा रखता हँ । सरकार इस पर जल्दी गौर करे क्योंकि अभी वह जहाज 5 लाख के अंदर आ जायेगा । बाकी 5 लाख का मैं पेट्रोल भरवा लँगा । अगर जहाज की कीमत इस बीच बढ़ गई तो फिर मेरे मुआवजे की राशि भी बढ़ जायेगी ।

मित्रों अब पूरी खबर भी पढ़ लीजिये क्योंकि ऐसा सस्ता, हल्का, मजबूत और टिकाऊ जहाज तो आप भी खरीदना चाहेंगे । लातविया के कुछ वैज्ञानिक ये सस्ता टू सीटर विमान बना रहे हैं । (भइया मेरे पप्पू के लिये भी एक छोटी सी सीट लगा देना वर्ना वो बेचारा स्कूल कैसे जायेगा ।) इस विमान की कीमत 6500 डालर पड़ेगी यानि करीब साढ़े तीन लाख रूपये । भारत में बेचेंगे तो हो सकता है थोड़ा मँहगा बेचें सो आप पांच लाख का इंतजाम करके रखो । ये जहाज फाइबर और डयूरालोमिनियम से बनेगा । भइया चाहे अलमूनियम से बनाओ या डयूरालोमिनियम से उड़ना चाहिये बस । इस हवाई जहाज के लिये छोटी सी हवाई पट्टी की जरूरत पड़ती है । सो इसके लिये मेरे घर की छत से काम चल जायेगा । मकान मालिक थोड़ा बड़बड़ायेगा तो एकाध बार उसको भी उड़वा देंगे । छत पर एक छोटी सी फूस की मड़ई है । अपना पुष्पक विमान वहीं पर रात को विश्राम करेगा । इस विमान में दो इंजन लगेंगे । हलांकि वह उड़ेगा एक से ही पर टेक ऑफ के लिये दो की जरूरत होगी । अच्छा है एक से उड़ेगा तो पट्रोल की बचत होगी । कंबख्त वैसी भी 50 रू. लीटर है । चलो इसी बहाने पेट्रोलपंप का भी मुंह देख लेंगे क्योंकि अपनी साइकिल में तो सिर्फ बरासत बाद ही ऑयलिंग ग्रीसिंग होती है ।

मित्रों, इस विमान में सुरक्षा के भी बेहतरीन इंतजाम हैं । अब जैसे आप का उड़ते वक्त तेल खत्म हो जाये तो जहाज सटाक से जमीन की तरफ लपकेगा । आप सोचोगे कि इस पुष्पक विमान के साथ साथ आप भी राम जी को प्यारे होने वाले हो पर ऐसी हालत में बिल्कुल न डरे । दिल को कड़ा करें । जान है तो जहान है । जहाज का बीमा आपने जहाज खरीदते वक्त ही करवा लिया था और नीचे जमीन पर रहने वालों को बचाने से ज्यादा जरूरी है कि आप अपने आप को बचायें । यह पानी का जहाज नहीं है कि जहाज के साथ साथ कप्तान भी डूब मरे । यह हवाई जहाज है । अब ज्यादा सोचने का टेम नहीं है पागल । सीट के नीचे पैराशूट है जिसका पैसा कंपनी वाले आपसे पहले ही वसूल चुके हैं । पीठ में बांध कर कूद पड़ पर क्योंकि पतंगे अब नजदीक आ गई हैं ।

इस तरह आप पुष्पक विमान का भी मजा ले लोगे और बजरंगबली की जरह सेफ लैडिंग भी कर लोगे । इस जहाज को लेकर और सब तो खुश हैं पर हवाई प्रशासन परेशान है । जहाज सस्ता हो जायेगा तो हर आदमी मारूती छोड़ कर जहाज ही खरीदेगा । आसमान में ट्रैफिक बढ़ जायेगी तो ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था करनी पड़ेगी । ट्रैफिक सिंग्नल और लाईटें लगानी पड़ेंगी । सो खर्चा बढ़ेगा । अगर कोई जहाज ट्रैफिक के नियम तोड़ कर भागेगा तो ट्रैफिक पुलिस वाला बुलेट से चहेट कर चालान काट नहीं सकता । इसलिये कुछ हवाई जहाज उड्डयन प्रशासन को भी खरीदने पड़ेंगे । कोई आदमी दारू पीकर न विमान उड़ाये इसके लिये भी व्यवस्था करनी पड़ेगी । ये खतरनाक बात है, क्योंकि दारू पीकर चलाने वाले एक्सीडेंट ज्यादा करते हैं । तो ऊ लोग किसी की भी खोपड़ी पर जहाज गिरा सकते हैं । दुर्घटना होने का डर है । मेरा कंपनी वालों को एक सुझाव है । वो जहाज के अंदर हैंडिल के पास एक मशीन लगा दे जो कि पायलट की नाक सूंघ कर ही जहाज स्टार्ट करने दे । जहाज का कंप्यूटर घुसते ही चेतावनी दे दे कि नशा पत्ती करने वाले, पान बीड़ी, सिगरेट, दारू, चरस, गांजा पीने वाले नशा उतरने के बाद ही जहाज पर चढ़ें । नहीं तो मरें ।

मित्रों यह जहाज एक साल बाद बन कर तैयार होगा सो अभी सरकार के पास काफी टाइम है मेरी ऐतिहासिक साइकिल खरीदेने के लिये, पर ज्यादा देर न करें । जरूरी हो तो केबिनेट की मीटिंग भी बुलवा लें । एक साल अभी बाकी है और बरसात भी आ गई है सो सालाना सर्विसिंग भी करवा लेता हँ । आप लोग भी सेविंग एकाउंट खोल लो । पांच लाख इकट्ठे करने हैं । मैं चलता हूं । पप्पू के स्कूल का टाइम हो गया है और वह बस्ता लेकर मेरे सामने खड़ा है ।

अब दिखा बचके भगवान

भगवान बहुत चालू चीज होता है मित्रों । कहते हैं कि भगवान कण कण में छिपा है । तो ढूंढने वालों ने मैग्नीफाइंग लेन्स लेकर पहले तो जितने प्रकार के कण हो सकते थे, उनमें ढूंढा । भगवान जी थोड़ा महीन टाईप भगवान थे, नहीं मिले । फिर जब माइक्रोस्कोप का अविष्कार हुआ तो एक बार फिर ढूंढाई चालू हुयी । इस चक्कर में साला अणु, परमाणु, न्यूट्रान, प्रोटान, इलेक्ट्रान, क्वाट्र्ज, एक से बढ़ कर एक ससुरे घर-घुस्सू मिल गये लेकिन वो नहीं मिला जिसे भगवान कहते हैं । लगे रहे वैज्ञानिक भाई लोग ढूंढने में। कभी अपने खर्चे पर, कभी सरकारी खर्चे पर ।

पिछले दिनों जिनेवा में महामशीन का प्रयोग सफल हो गया । वैज्ञानिक दशकों से प्रयोगशाला में बिग बैंग जैसी परिस्थिति पैदा करने में लगे हुये थे । कई बार बिगड़ने के बाद साइंसदानों ने मार ठोंक-पीट कर एल0एच0सी0 मशीन को अंत में चला ही दिया । 27 किलोमीटर लंबी मशीन में प्रोटान के कणों की प्रकाश की गति से आपस में टक्कर करायी गयी । साइंसदानों का मानना है कि इस टक्कर से सबसे सूक्ष्म भौतिक कण ‘हिग्स बोसोन’ जिसे “ब्रह्मकण“ भी माना जा रहा है अंत में बिलबिला कर बाहर निकलेगा ।

तो मित्रों, जैसा कि समझा जा रहा है ‘हिग्स बोसान’ ही असल में वह कण है जिसमें परमात्मा उर्फ ब्रह्म या कहिये कि भगवान जी विराजमान रहते हैं, अब वह सामने आ जायेगा । तो मित्रों, अब वो समय दूर नहीं जब सस्ती दरों पर छोटी व हल्की एल0एच0सी मशीनों का निमार्ण हुआ करेगा और हम अपने पूजा घर के अलावा, ड्राइंगरूम, बेडरूम, बाथरूम, किचेन, स्टोर, कार के डेशबोर्ड पर और यहां तक कि गाड़ियों की नम्बर प्लेट के ऊपर भी एक दम 24 कैरेट के शुद्ध भगवान फैविकाल से चिपका कर चलेंगे ।

मजा आ जायेगा । सारा वातावरण भगवानमय होगा । उस चोर की तरह छिपे भगवान को हम एक दम से एक्सपोज कर देंगे और जब जरूरत होगी, मतलब भर का आशीर्वाद या वरदान मांग कर काम पर चल देंगे । नास्तिक सालों की बैण्ड बज जायेगी (कम्यूनिस्टों की भी) और पण्डितों का धंधा सरपट दौड़ने लगेगा । पण्डितजी लोग तब सालिग्राम की गोली की जगह छोटी से एल0एच0सी मशीन डिब्बी मे धर कर, तिलक लगा, स्कूटर पर बैठ जजमानों की अंटी ढीली करने निकलेंगे ।

अदालतों में गीता, कुरान, बाइबिल की जगह एल0एच0सी मशीने ले लेंगी । गवाह कहेगा ”मैं एल0एच0सी मशीन को हाजिर नाजिर मान कर सच कहूंगा । सच के सिवा कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि इस कटघरे में खड़े होकर जो भी कहो सच मान लिया जाता है ।“

कलैण्डर छापने वालों और मूर्तियां बनाने वालों के धंधे में कभी न खत्म होने वाला रिशेसन आ जायेगा । मंदिरों, गिरजाघरों, मस्जिदों और गुरूद्वारों में या तो ताले लग जायेंगे या फिर वहां बड़ी बड़ी एल0एच0सी मशीनें लगा दी जायेंगी । ये भी हो सकता है कि मंदिरों के ऊपर बड़े बड़े अक्षरों में ”नक्कालों से सावधान“ का बोर्ड लगा मिलने लगेगा ।

लेकिन मित्रों एक दिक्कत फिर भी आ सकती है । धार्मिक ग्रंथों में ये भी लिखा है कि जो परमतत्व परमात्मा है, असली वाले, वो बिचारे सिर्फ ”दृष्टा“ हैं । बस देखते रहते हैं । करते कुछ नहीं हैं । या तो एक नम्बर के आलसी टाईप भगवान हैं या फिर बहुत समय से फालिस के शिकार हैं। काम करने के लिये उन्होंने एक आया रख छोड़ी है जिसे कुछ लोग माया कहते हैं (और मुलायमसिंह जी मायावती कहते हैं) । बिना माया के ईश्वर में कुछ हरकत नहीं होती है । एक दम्मै से बेड रेस्ट पर रहने वाले मरीज की तरह । तो जो भगवान खुद उठकर एक गिलास पानी भी नहीं पी सकता ऊ इंसानों का दुख कैसे दूर करेगा । ये ”दृष्टा“ वाली बात कुछ सही भी लगती है क्योंकि भगवान हो कर कोई भूकंप, सुनामी, आतंकवाद, गरीबी, बीमारी वगैरह जैसे शैतानी काम क्यों करेगा जिससे लाखों करोड़ों लोग टैं हो जाते हैं ।

तो यह बात पक्की की भगवान किसी काम के नहीं होते हैं । वो खुदै एक तरफ पड़े रहते हैं । सारा काम तो माया मैम साहब करती हैं । जिन्हें काम करने से मतलब । अगर पृथ्वी पर प्रलय आती है और आदमी ससुरे जबरदस्ती मर मरा जाते हैं तो वो क्या करें । वही सरकारी ठसक । चाहे मायावती वाली मानें या फिर सोनिया गांधी वाली ।

तब फिर क्या होगा । कुछ नहीं दीपावली पर फिर गणेश लक्ष्मी की पूजा करनी पड़ेगी क्योंकि वो एल0एच0सी मशीन वाले तो मशीन के अंदर कड़कड़ाकर रह जायेंगे और हम लोगों को सिर्फ दृष्टा के दर्शनों का ही लाभ मिलेगा और कुछ नहीं । तब ? तब क्या ! स्टूडेंट लोग फिर सरस्वती मंत्र का जाप करना शुरू कर देंगे और इम्तिहान में अगर क्वेश्चन नहीं फंसे तब बजरंगबली को मत्था नवाया जायेगा । यानी की लौट कर बुद्धू घर को वापस वाली पोजीशन हो सकती है । तब क्या एल0एच0सी मशीन तैयार करने में लगें अरबों खरबों रूपये डूब जायेंगे ? पूरे नहीं डूबेंगे क्योंकि मार्केट तो सभी मशीने बेच चुका होगा । मशीन की पूरी गारण्टी रहेगी पर काम पूरा होने की नहीं । अंत में उपभोक्ता बेचारा ब्रह्मलीन हो कर रहेगा क्योंकि सिर्फ दृष्टा वाले ब्रह्म को देख देख कर अंत में उसकी भी तो वही गति होनी है । एक मजबूर दृष्टा की । दोनों लोग एक दूसरे को देखते रहो । भक्त और भगवान का मिलन हो जायेगा और भक्त सारे काम काज छोड़ कर सिर्फ मूक दृष्टा भर रह जायेगा ।
धत्त तेरे की । घूर घूर कर साली आंख पिराने लगी । बस करो । जरा टी0वी0 पर आस्था लगाना । रामदेव जी अनुलोम विलोम करवा रहे होंगे ।

<=यूरेका यूरेका ! अब तो अपन भी ब्रह्मास्मि ।
<=अबे काहे का भगवान ! किसी काम तो आता नहीं, बैठे बैठे बिजली का बिल ऊपर से बढ़ाता है अलग ।

कल की बात पुरानी : भाग -1

पृथ्वी पर तीन रत्न हैं – जल, अन्न और सुभाषित । लेकिन मूर्ख लोग पत्थर के टुकडों को ही रत्न कहते रहते हैं । – संस्कृत सुभाषित   ब...